अनात्म या अनात्मीय?

बौद्ध धर्म समझने के प्रारंभिक कदम में ही एक अड़चन आ जाती है, और वह है “अनत्ता” का शिक्षण, जिसे अक्सर “अनात्म” या “आत्म/स्वयं के अस्तित्वहीनता” के रूप में सिखाया जाता है। इस पर अटक जाने के दो कारण हैं। पहला यह, कि यह बात – आत्म या स्वयं की अस्तित्वहीनता – बाकी बौद्ध सिद्धांतों से मेल नहीं खाती, जैसे कि कर्म का सिद्धांत। अगर आत्म नहीं, तो कर्मों के फल कौन भोगता है? पुनर्जन्म कौन लेता है? अटकने का दूसरा कारण यह, कि यह बात बुद्ध के पूरे शिक्षण को नकारती लगती है – अगर मैं स्वयं हूं ही नहीं, तो साधना का क्या फ़ायदा? किसको लाभ होने वाला है?

ढेरों लेखक इन प्रश्नों पर चर्चा करते आए हैं, मगर पाली सूत्रों में इनका कोई उल्लेख नहीं। वास्तव में, इकलौती बार जब बुद्ध से कोई सीधा-सीधा पूछता है कि आत्म है के नहीं, वे उत्तर नहीं देते। बाद में, अपने मौन का कारण पूछे जाने पर, कहते हैं कि कोई भी उत्तर देना – या तो हां, आत्म है, या फिर ना, आत्म नहीं है – दोनों घोर प्रकार की मिथ्या दृष्टि में आते हैं, जिनको अपनाने पर उनका सिखाया गया साधना का मार्ग असंभव हो जाता है। इसलिए प्रश्न ही छोड़ देना उचित है।

इस प्रश्न पर उनका मौन रहना अनत्ता के बारे में क्या कहता है, यह समझने के लिए हमें पहले देखना होगा कि बुद्ध प्रश्नों के बारे में क्या सिखाते हैं – प्रश्न पूछने, उत्तर दिने, और उत्तर समझने के उचित ढंग क्या हैं?

अंगुत्तर निकाय ४:४२ (“पञ्हब्याकरण सुत्त” यानी कि “प्रश्नों के व्याकरण वाला सूत्र”) में बुद्ध प्रश्नों को चार वर्गों में बांटते हैं – वैसे प्रश्न जिनका सीधा उत्तर दिया जाना चाहिए – जैसे “हां” या “ना,” वैसे प्रश्न जिनका विष्लेषण करके उत्तर दिया जाना चाहिए, वैसे प्रश्न जिनके उत्तर में पूछने वाले से ही प्रति-प्रश्न पूछा जाना चाहिए, और वैसे प्रश्न जिन्हें एक ओर रख कर उपेक्षित कर देना चाहिए। इस आखरी वर्ग में शामिल हैं वे प्रश्न जो दुख के अंत की ओर नहीं लेकर जाते। किसी आचार्य का प्रश्न पूछे जाने पर पहला कर्तव्य है यह पता लगाना कि प्रश्न किस वर्ग का है, और फिर उसके मुताबिक ही उत्तर देना। किसी उपेक्षा करने योग्य प्रश्न के उत्तर में सीधा “हां” या “ना” नहीं कह देना चाहिए। उपेक्षा योग्य प्रश्न पूछने वाले को यदि जवाब मिल जाए, तो उसे देखना होगा कि उत्तर की व्याख्या किस हद तक की जानी चाहिए। बुद्ध ने कहा कि दो प्रकार के लोग उन्हें गलत तरह से प्रस्तुत करते हैं – वे, जो उनकी उन बातों का निष्कर्ष निकालते हैं जिनका निष्कर्ष निकालना अनुचित है, और वे, जो उनकी उन बातों का निष्कर्ष नहीं निकालते जिनका निष्कर्ष निकालना उचित है।

भगवान बुद्ध की वाणी को समझने के ये बुनियादी नियम हैं, मगर यदि हम अनत्ता के सिद्धांत पर अधिकांश लेखकों के विचार पढ़ें, तो पाएंगे कि ये मूलभूत नियम भुला दिए गए हैं। कुछ लोग कहते हैं कि बुद्ध ने किसी “नित्य आत्मा” या “पूरे ब्रह्मांड से अलग आत्मा” के अस्तित्व का इनकार किया है, और इस प्रकार ये लेखक “आत्मा की अस्तित्वहीनता” वाली व्याख्या का विस्तार करते हैं। मगर यह कहने से तो उस प्रश्न का विश्लेषण करके उत्तर दिया जा रहा है जिसे बुद्ध उपेक्षा योग्य दिखलाते हैं। अन्य लोग सूत्रों के कुछ वचनों से “आत्म नहीं है” वाला निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करते हैं, मगर ऐसा लगता है कि अगर उन वचनों का उपयोग एक उपेक्षा-योग्य प्रश्न के उत्तर देने के लिए किया जा रहा है, तो यहां जबरदस्ती से निष्कर्ष निकालना अनुचित बात हुई।

तो, आत्म है या नहीं – पूरे लोक से संयुक्त या अलग, नित्य या नश्वर – इस प्रश्न के उत्तर में “ना” कहने की जगह बुद्ध मानते हैं कि प्रश्न ही भ्रमित है। क्यों? क्योंकि “स्वयं” और “अन्य” के बीच की रेखा जैसे भी परिभाषित की जाए, स्वयं की अवधारणा में आसक्ति की झलक तो होगी ही, यानी कि दुख और तनाव की। यह बात एक संयुक्त आत्म पर भी उतनी ही लागू होती है, जिसके लिए “अन्य” कुछ नहीं, जितनी कि अलग या वियुक्त आत्म पर। अगर तुम पूरी प्रकृति को अपना आप मानते हो, तो प्रत्येक पेड़ के काटे जाने पर दर्द होगा। साथ ही, यह बात एक पूरी तरह से “अन्य” ब्रह्मांड पर भी लागू होती है, जिसमें अलगाव, अकेलेपन और निरर्थकता का आभास इतना घातक हो जाएगा कि सुख खोजना ही असंभव हो जाए। “क्या मैं हूं? क्या मैं नहीं हूं?” – बुद्ध इन प्रश्नों की उपेक्षा करने की सलाह देते हैं क्योंकि इनका उत्तर जैसे भी दिया जाय, दुख का स्रोत ही बनेगा।

“स्वयं” और “अन्य” के प्रश्नों में निहित दुख से बचने के लिए, बुद्ध एक दूसरे ढंग से अनुभव को विभाजित करते हैं – चार आर्य सत्यों के जरिए, यानी कि दुख, उसका कारण, उसका निवारण, और निवारण का मार्ग। ये सत्य कोई दावे नहीं हैं, ये अनुभव के वर्ग हैं। इन वर्गों को स्वयं या अन्य से जोड़कर देखने की बजाय, वे कहते हैं, इन्हें बस अपने आप में पहचानना चाहिए, अपने ही संदर्भ में, जैसे घटित होते हैं, और इनसे जुड़े कर्तव्यों को निभाना चाहिए। दुख को समझना चाहिए, उसके कारण को छोड़ देना चाहिए, उसके निवारण का साक्षात्कार करना चाहिए, और निवारण के मार्ग का विकास करना चाहिए।

अनत्ता के सिद्धांत को इन कर्तव्यों के संदर्भ में समझना चाहिए। अगर तुम शील, समाधि और प्रज्ञा का मार्ग विकसित करके एक शांत और सुखद मानसिक स्थिति तक पहुंच सको, और उस स्थिति का उपयोग करके अनुभव को चार आर्य सत्यों के तौर पर देख सको, तो मन को ऐसे प्रश्न नहीं सूझते कि “क्या आत्म है? मेरा आत्म क्या है?” बल्कि ऐसे, कि “इस घटना को पकड़कर रखने से क्या दुख और तनाव पैदा होता है? क्या यह सच में ‘मैं’ या ‘मेरी’ है? अगर दुखद है, पर ‘मैं’ या ‘मेरी’ नहीं, तो क्यों पकड़कर रखूं?” ये आखरी प्रश्न सीधे उत्तर के लायक हैं, क्योंकि वे दुख समझने में और आसक्ति घटाने में मदद करते हैं। ऐसा करते करते, दुख का कारण, यानी कि आसक्ति, धीरे धीरे समाप्त होता जाता है। अंत में,‌ पूरी तरह खत्म होने पर बस असीमित मुक्ति ही बचती है।

इस प्रकार, अनत्ता की शिक्षा “आत्म नहीं है” का सिद्धांत स्थापित नहीं कर रही, बल्कि दुख समाप्ति की एक “अनात्मीय” रणनीति है, जिसके जरिए दुख का कारण छोड़कर सर्वोत्तम सुख पाया जा सकता है। उस अवस्था में, आत्म है, नहीं है, मैं या मेरा क्या है, ये सारे प्रश्न कोई मायने नहीं रखते। आखिरकार, इतनी संपूर्ण मुक्ति के अनुभव में अनुभव करने वाले की कहां कोई परवाह, या यह पता लगाने कि, कि वह आत्म है या नहीं?