निर्वाण का मार्ग कुशल इरादों से बनता है
एक पश्चिमी कहावत है, कि नरक का मार्ग भले इरादों से बनता है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। नरक का मार्ग तो काम-वासनापूर्वक, स्वार्थी और दूषित इरादों से बनता है। भले इरादे – अहिंसक और नेक – सुख के स्वर्गों की ओर ले जाते हैं। तो उनकी प्रतिष्ठा इतनी बुरी क्यों है? इसके तीन मुख्य कारण हैं –
पहला यह, कि सभी भले इरादे कुशल नहीं होते। वे अवसर के लिए अनुचित हो सकते हैं, और इसलिए परिणाम में दुख और पछतावा ला सकते हैं।
दूसरा कारण यह, कि हम अक्सर अपने इरादों की गुणवत्ता को गलत समझते हैं। जैसे कि, यदि हम एक भले और बुरे गुणों से मिश्रित इरादे को केवल भला मान लें, पर फिर मिश्रित परिणाम पाने पर निराश हो जाएं।
तीसरा कारण यह, कि हम इरादे और परिणाम के संबंध को समझते नहीं। उदाहरण के लिए, मानो कि हमें एक पुराने बुरे इरादे का दुखद परिणाम वर्तमान में महसूस हो रहा हो, और वर्तमान में एक भले इरादे के परिणाम को धुंधला रहा हो, पर हम दुख के लिए अपने वर्तमान के इरादे को दोषी ठहराएं।
इन कारणों की वजह से, हम भले इरादों की क्षमता पर विश्वास करना छोड़ देते हैं। हम उन पर शक करने लगते हैं, और उनमें श्रेष्ठता लाने की परवाह नहीं करते।
भगवान बुद्ध की सबसे गहरी खोजों में से एक यह है कि हमारे इरादे ही हमारे जीवन के प्रमुख रचनाकार हैं, और उन्हें कौशल के रूप में संपन्न किया जा सकता है। किसी भी कौशल में संपन्नता प्राप्त करने के लिए सजगता, स्मरण-शक्ति, दृढ़ता और समझदारी जैसे गुणों की आवश्यकता होती है। यदि हम अपने इरादों और मनोवृत्तियों के संबंध में इन गुणों का विकास करें, तो हम उन्हें भी कुशल बना सकते हैं। इतने कुशल कि वे हमें किसी भी स्थिति में पछतावे या हानि से बचा सकते हैं। अंत में, वे हमें सबसे सच्चे सुख की ओर ले जा सकते हैं।
इस तरह अपने इरादों को प्रशिक्षित करने के लिए, गहरे आत्म-निरीक्षण की आवश्यकता होती है। ऐसा क्यों? ज़रा भले इरादों पर अविश्वास के हमारे कारणों को ध्यान से देखो। उन सबका मूल तत्व है भ्रम। जैसा कि बुद्ध बताते हैं, राग (यानी कि लोभ और वासना), द्वेष (यानी कि घृणा) और मोह (यानी कि भ्रम) अकुशल इरादों की तीन मुख्य जड़े हैं। कुशल जड़ें लोभ-रहित, द्वेष-रहित और भ्रम-रहित मनोस्थितियों से उत्पन्न होती हैं। अप्रशिक्षित, साधारण मन की मिट्टी में ये कुशल और अकुशल जड़ें आपस में उलझी हुई होती हैं। यदि हम अकुशल जड़ों को अलग करके उखाड़ न दें, तो हम अपने इरादों पर पूरा विश्वास नहीं कर पाएंगे। यहां तक कि, मन में कुशल वृत्ति प्रमुख होने पर भी अकुशल जड़ें तुरंत शाखाएँ भेजकर हमें अंधा बना सकती हैं।
मोटा-मोटा समझें तो बात कुछ ऐसी दिखती है – नरक की सड़क बुरे इरादों से बनती है, जिनमें से कुछ सरसरी निगाह पर भले भी लग सकते हैं। भले ओर कुशल इरादों से बने रास्ते, जो स्वर्ग की ओर जाते हैं, नरक की सड़क के साथ ही निकलते हैं, लेकिन अक्सर अकुशलता की झाड़ियों में छिप जाते हैं। बुद्ध की खोज यह थी कि अगर हम कुशल जड़ों को पोषित करें, तो वे नरक की सड़क को ढक सकतीं हैं। अगर हम अकुशलता की झाड़ियों को काट कर उन्हें जड़ से उखाड़ दें, तो हम अपने भले इरादों की कुशलता को संपन्न कर सकते हैं, जब तक कि अंततः वे हमें, कोई मार्ग की आवश्यकता से परे, एक असीमित सुख तक पहुंचा न दें।
इस प्रक्रिया का सबसे आधारभूत चरण है खुद को नरक के रास्ते से दूर रखना। यानी कि, जान-बूझकर अकुशल इरादों की जगह कुशल इरादों का विकास करना। इसका पालन उदारता और शील-सदाचार की साधना से शुरू होता है। फिर हम ध्यान की साधना से अपनी वृत्तियों को और परिशोधित करते हैं, राग, द्वेष और मोह की जड़ों को खोदते हैं ताकि वे हमारे जीवन के विकल्पों को प्रभावित न करें। राग और द्वेष तो कभी-कभी पहचान में आ जाते हैं, लेकिन मोह यानी कि भ्रम, अपने स्वभाव से अस्पष्ट और छिपा हुआ होता है। भ्रम के वश में होते हुए हमें अपने भ्रम का पता थोड़ी न चलता है। इसलिए हमें साधना द्वारा सजगता और स्मरण-शक्ति को प्रबल और शीघ्र करने में ध्यान लगाना चाहिए, ताकि हम मोह को देख सकें और मन पर सवार होने से पहले ही उखाड़ फेंक डालें।
इरादों को परिशोधित करने के लिए बुद्ध के सबसे बुनियादी ध्यान निर्देश शुरू होते हैं ध्यान के आसन पर नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के कार्यों में। अपने सात-वर्षीय पुत्र राहुल को दिये गये प्रवचन (मज्झिम निकाय ६१) में भगवान दो तरीकों से भ्रम की समस्या से निपटते हैं। पहला, जिसे पाली में कहते हैं “योनिसो मनसिकार,” यानी कि “उचित विषय पर उचित ढंग से ध्यान देना।” इसका अर्थ है, अपने अनुभव के उचित पहलुओं पर ध्यान देना, मतलब खुद से सही प्रश्न पूछना, ऐसे प्रश्न जो मन को व्यर्थ बातों में उलझाए बिना, सीधा सुख और दुख के कारणों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। दूसरा तरीका है “कल्याण मित्रता,” जिसका अर्थ है सदाचारी, उदार और प्रज्ञावान लोगों से जुड़ना, सीखना और उनके गुणों को धारण करना। बुद्ध ने कहा कि ये दो कारक मार्ग पर साधक के लिए सबसे उपयोगी आंतरिक और बाहरी सहायक बनते हैं।
संक्षेप में, बुद्ध ने राहुल को यह सिखाया कि अपनी मानसिक स्थिति को परखने के लिए अपने ही कर्मों को दर्पण की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। हर कर्म करने से पहले – और यहाँ “कर्म” का अर्थ है विचार, शब्द या शरीर का कोई भी कार्य – उस कर्म से अपेक्षित परिणाम पर चिंतन करना चाहिए और स्वयं से पूछना चाहिए – “क्या इस कार्य से मेरी या दूसरों की हानि होगी?” अगर हानि कि अपेक्षा हो, तो वैसा कार्य नहीं करना चाहिए। अगर कार्य हानिरहित लगे, तो उसको आगे बढ़ाना ठीक है।
मगर बुद्ध ने राहुल को सावधान किया, कि आँख मूंदकर अपनी अपेक्षाओं पर भरोसा नहीं करना चाहिए। कार्य करने के दौरान खुद से फिर पूछना चाहिए, कि क्या कोई अनपेक्षित दुष्परिणाम प्रकट तो नहीं हो रहा। यदि हो रहा हो, तो रुक जाना चाहिए। यदि नहीं, तो अंत तक उस कार्य को जारी रखना ठीक है।
हालांकि, तब भी चिंतन का काम पूरा नहीं हुआ। कार्य के अल्पकालिक और दीर्घकालिक परिणामों पर भी ध्यान देना चाहिए। अगर किसी कथनी या करनी से किसी का नुकसान हुआ हो, तो अपने गुरु या प्रज्ञावान साथियों को बताकर उनकी सलाह लेनी चाहिए। अगर केवल मन का दुष्कर्म हुआ हो, तो वैसे विचार के प्रति शर्म और घिन की भावना जगानी चाहिए। दोनों ही मामलों में, फिर उस गलती को न दोहराने का संकल्प लेना चाहिए। परंतु, अगर मूल कार्य के दीर्घकालिक परिणाम हानिरहित साबित हों, तो खुद को सही रास्ते पर पाने का आनंद लेकर, अपना प्रशिक्षण जारी रखना चाहिए।
इससे जाहिर होता है कि भ्रम को उजागर करने का आवश्यक उपाय एक जाना-पहचाना उसूल ही है – अपनी गलतियों से सीखना। परंतु, बौद्ध संदर्भ में इसके कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं, क्योंकि यह कार्य हमसे उन्हीं क्षेत्रों में सच्चाई और धैर्य मांगता है जहाँ आमतौर पर हमारे लिए सबसे कठिन होता है – हमारे अपने ही इरादों के, कार्यों के, और उनके परिणामों के मूल्यांकन में।
बचपन में, सज़ा या डांट से बचने के लिए, हम अपने इरादों के बारे में बेइमान बनना सीख लेते हैं, जैसे कि – “मैंने जानबूझ कर नहीं किया,” “मुझसे रुका नहीं गया,” “मैं तो बस अपनी बाँह घुमा रहा था और वो रास्ते में आ गया।” ऐसा करते-करते, हम अपने बहानों पर विश्वास करने लगते हैं, और दूषित इरादों को अनदेखा करने लगते हैं। नतीजतन, अपने इरादों को अस्पष्ट रखने की, और उनके परिणामों की उपेक्षा करने की, हमारी आदत बन जाती है। कई बार, हम इस बात का इनकार कर देते हैं कि हमारे पास और कोई विकल्प भी था। ऐसे ही बुरी लतें लगती हैं और अकुशल वृत्तियों को खुली छूट मिल जाती है।
कर्म के परिणाम मिलने पर, हमारी प्रतिक्रिया के दौरान भी कुछ ऐसा ही होता है। हम कम ही उम्र में सच्चाई का इनकार करना सीख लेते हैं, जैसे कि – “यह मेरी गलती नहीं थी,” “मेरे इस पर लेटने से पहले ही यह टूटा हुआ था” – और फिर अपने अभिमान को संभालने के लिए, इस प्रक्रिया को अपनी आत्म-पहचान में अपना लेते हैं। इस हद तक कि अपनी गलतियों के प्रभाव को अनदेखा करना हमारी प्रकृति का अंग बन जाता है।
जैसा कि बुद्ध समझाते हैं, दुख को समाप्त करने के लिए हमें तृष्णा और अविद्या को त्यागना होगा, पर अगर हम अपने इरादों के बारे में अपने से ही सच्चे नहीं हो पाएंगे, तो हम तृष्णा को त्यागने के लिए उसे समय पर कैसे पहचान पाएंगे? अगर हम अपने ही कार्यों में कारण और परिणाम के उसूल का सामना नहीं कर सकेंगे, तो अविद्या पर कैसे विजय प्राप्त करेंगे? अविद्या का मूल कारण जानकारी का अभाव नहीं है, बल्कि सजगता और आत्म-सच्चाई का अभाव है। आर्य सत्यों को समझने के लिए स्वयं से सच्चा रहना आवश्यक है, बिल्कुल उन्हीं क्षेत्रों में जहां आत्म-सच्चाई सबसे कठिन होती है।
साथ ही, धैर्य और दृढ़ता भी आवश्यक हैं। अपनी वृत्तियों को जांचते-जांचते, अकुशल इरादों को टालना सीखना होगा। इस भांति अटल रहकर, कि वे रुक जाएं, पर इतनी ज़बरदस्ती से नहीं, कि वे मन की गहराइयों में कहीं दब जाएं। हम मन को एक सभा के रूप में देखना सीख सकते हैं – सभा के कुछ सदस्यों की दूषित वृत्तियों के कारण हम दूषित नहीं बन जाते। सभा के मंच पर प्रस्तुत किये गये प्रत्येक मुद्दे के लिए हम ज़िम्मेदार नहीं। मुद्दे को स्वीकार या इनकार करने की शक्ति में हमारी ज़िम्मेदारी है।
इसके साथ, अपनी पुरानी आदतों या सहज वृत्तियों पर पूरा भरोसा करने वाला बचपना, हमें छोड़ देना चाहिए। पहला विचार हमेशा सही विचार नहीं होता। हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि कभी-कभी मनचाहे कर्मों के परिणाम दुखदायक हो सकते हैं। जैसे कि बुद्ध ने कहा, हर पल हमारे पास कर्म के चार विकल्प होते हैं – ऐसा कर्म जिसे करने कि इच्छा हो और जिसका परिणाम भी अच्छा हो; जिसे करने कि इच्छा न हो और जिसका परिणाम भी बुरा हो; जिसे करने कि इच्छा हो मगर जिसका परिणाम बुरा हो; और जिसे करने कि इच्छा न हो मगर जिसका परिणाम अच्छा हो। पहले दो प्रकार तो आसान हैं – पहले को करने और दूसरे को नहीं करने के लिए बहुत बुद्धि की ज़रूरत नहीं होती। असली बुद्धि तो बाकी दो विकल्पों से निपटने के ढंग में दिखाई देती है।
और तो और, कर्म के परिणाम जांचने के लिए विनम्रता भी आवश्यक है। अपने आप को हमेशा सही साबित करना कोई असली आत्मसम्मान का आधार नहीं बन सकता। साथ ही, अपनी भूल को स्वीकार करने में कोई अपमान नहीं होता। हम सब भ्रम की स्थिति से आ रहे हैं। बुद्ध भी बोधि की खोज में भ्रम से ही आ रहे थे, तो स्वाभाविक है कि गलतियाँ तो होंगी ही। अपनी गलतियों को पहचानना, उन्हें सुधारने का संकल्प लेना, और इस संकल्प का कड़ाई से पालन करना, इस क्षमता में ही मनुष्य का आत्मसम्मान होता है। और यह करने के लिए यह आवश्यक है कि हम पछतावे और पश्चाताप की भावनाओं से खुद को सज़ा न देते रहें। जैसा बुद्ध ने कहा, पश्चाताप से पुरानी भूल मिट नहीं सकती। बल्कि, पश्चाताप से मन की शक्ति दुर्बल हो जाती है, जिसके कारण भविष्य में वैसी गलती न दोहराना कठिन हो जाता है।
इसलिए बुद्ध पछतावे कि जगह एक दूसरी भावना को जगाने की सलाह देते हैं – शर्म। यहां, वे यह नहीं कह रहे कि खुद को नालायक समझकर शर्मिंदा होना चाहिए। याद करो कि दोनों बुद्ध और राहुल क्षत्रिय वर्ण के थे, और इसलिए उन्हें अपने आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा का एक तीव्र एहसास था। और, ध्यान दो कि बुद्ध ने राहुल को अपने आप को नहीं, अपनी गलतियों को शर्म से देखने को कहा है। इसका अर्थ यह है कि शर्मनाक तरीके से व्यवहार करना राहुल की प्रतिष्ठा से नीचे है। ऐसी शर्म आत्मसम्मान का संकेत है, आत्म-घृणा का नहीं। अपने दुष्कर्मों के प्रति शर्म महसूस करना राहुल का एक आदरणीय गुण है। यह गुण निश्चित करता है कि वह वैसी भूल दोहराने से बच जाएगा। ऐसा सम्मान एक स्वस्थ, उचित और लाभदायक शर्म का आधार है।
सरसरी नज़र पर, ऐसे निरंतर आत्म-निरीक्षण करना अपने जटिल जीवन को और जटिल बनाने का उपाय लगता है। परंतु, बुद्ध के निर्देश मन के प्रश्नों को निचोड़कर केवल सबसे आवश्यक मुद्दों पर ध्यान डालने का प्रयत्न करते हैं। बुद्ध अत्यधिक प्रश्नों को ग्रहण करने के खिलाफ़ साफ़-साफ़ चेतावनी देते हैं, खास तौर पर वैसे प्रश्न जो मन को निकम्मी उलझनों में लपेट दें – “मैं कौन हूं? क्या अंदर से नेक व्यक्ति हूं? या नालायक हूं?” बल्कि, बुद्ध हमें अपने इरादों और वृत्तियों पर ध्यान देना सिखाते हैं, ताकि हम अपने जीवन पर उनके प्रभाव को समझ पाएं और यह कारण-और-परिणाम की प्रक्रिया में निपुणता पाकर अपने जीवन को सुधारते चले जाएं। ऐसे ही सभी महान कलाकार और रचनाकार अपनी कला में कौशल और संपन्नता प्राप्त करते हैं।
दैनिक जीवन में अपने इरादों पर ऐसे ध्यान देते रहना साधना में भी उपयोगी साबित होता है। अपने कर्मों को हम कारण और परिणाम, कुशल और अकुशल के नज़रिए से देखकर अपने अनुभव को चार आर्य सत्यों के स्तर पर देखना शुरू कर लेते हैं – दुख की वजह (अकुशल कारण), दुख-समाप्ति का मार्ग (कुशल कारण), दुख (दुखद परिणाम), और दुख का अंत (सुखद परिणाम)। जिस प्रकार बुद्ध ने राहुल को अपने कर्म-फलों का मूल्यांकन करना सिखाया – कर्म करते हुए भी, और करने के बाद भी – उससे उनकी बोधि की सबसे मूलाधार विद्या दर्शाई जाती है, जो यह है कि इरादों के परिणाम तत्कालीन वर्तमान में भी होते हैं, और समय के बाद भी।
जब हम वर्तमान काल को इस दृष्टिकोण से देखते हैं, तो समझ आता है कि हमारा वर्तमान का अनुभव “खुद-ब-खुद” नहीं हो रहा है। बल्कि, वह हमारी संगत का परिणाम है – हमारे वर्तमान के इरादे, उनके परिणाम, और हमारे अतीत के इरादों के परिणाम की संगत – जिनमें वर्तमान इरादे सबसे प्रमुख कारक हैं। जितना हम इस संगत पर ध्यान दें, उतना इसे मन की धुंधली गहराईयों से उभारकर चेतना की रौशनी में प्रकट कर सकते हैं। वहाँ, हम अपने इरादों और वृत्तियों को प्रशिक्षित कर सकते हैं, प्रयत्न करते-करते, गलतियों को सुधारते-सुधारते, जिससे हम पाएंगे कि दुख सच में घटता जा रहा है। इस प्रकार, दैनिक जीवन में कुशल इरादों से मानसिक सुख और स्वास्थ्य का रास्ता बनता है।
जैसे-जैसे हम अपने इरादों को कौशल के बेहतरीन स्तरों तक ले जाते हैं, हम पाते हैं कि सबसे कुशल इरादे वह वाले हैं जो मन को वर्तमान काल की स्पष्ट चेतना में सुरक्षित और सम्पूर्ण तरीके से केंद्रित कर देते हैं। जैसे-जैसे हम वर्तमान क्षण को गहराई से समझने लगते हैं, हमें बोध होता है कि सभी इरादे, जितने भी कुशल क्यों न हों, स्वाभाविक रूप से दुखदायक ही हैं। हमारे पास इस बोझ से मुक्ति पाने का एक ही उपाय बचता है – अपने वर्तमान क्षण के अनुभव को स्थाई रखने वाले इरादों को भी त्याग देना। फिर, इनके परे मौजूद असीमित मुक्ति के द्वार खुल जाते हैं।
इस प्रकार, कुशल इरादों से निर्वाण के बिल्कुल तट तक पहुंचने का रास्ता बनता है। फिर वहां से आगे, “आकाश में पंछियों की राह” जैसे, किसी मार्ग का पता नहीं चल सकता।




