हृदय के सत्यों का समर्थन

संवेग और प्रसाद पर बौद्ध शिक्षण

लोग बौद्ध धर्म को अधिकतर दिल की जगह दिमाग का खेल मानते हैं। बौद्ध दर्शन में मन की भावनाओं और कामनाओं के लिए कम ही जगह नज़र आती है। लेकिन, अगर हम परंपरा को गौर से देखें, तो पायेंगे कि शुरुआत से ही यह कुछ गहरी भावनाओं से संचालित रही है।

ज़रा युवा राजकुमार सिद्धार्थ गौतम के बारे में सोचो – बुढ़ापे, बीमारी, मृत्यु और प्रव्रज्या (सन्न्यास) से उनकी पहली मुलाकात कैसी रही होगी। युवा राजकुमार के दिल की प्रत्यक्ष और सच्ची भावनाओं के कारण यह बौद्ध परंपरा की सबसे लोकप्रिय कथाओं में से एक है। राजकुमार ने बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु में पूर्ण भय देखा, और केवल सन्न्यास में ही अपने छुटकारे की सारी उम्मीद टिका दी। जैसे महान बौद्ध कवि अश्वघोष ने कहा, युवा राजकुमार के पास ऐसे दोस्तों और रिश्तेदारों की कमी न थी जो उन्हें इस विचारधारा से बाहर निकालना चाहते थे। उन रिश्तेदारों की जीवन-समर्थक सलाह को अश्वघोष ने, बड़ी समझदारी से, बहुत आकर्षक तरीके से दर्शाया। फिर भी, राजकुमार को एहसास हुआ कि उनकी सलाह को मानने का मतलब अपने दिल को धोखा देना होगा। अपनी सच्ची भावनाओं के प्रति सच्चे रहकर ही वह अपने समाज के सामान्य मूल्यों से हटकर, एक ऐसे पथ पर चल पाए, जो उन्हें बोधि की ओर, जीवन और मृत्यु की सीमाओं से परे ले गया।

यह एक साधारण रूप से जीवन-समर्थक कहानी तो नहीं, लेकिन यह जीवन से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण बात का समर्थन करती है – एक ऐसे मन की सच्चाई जो एक परिशुद्ध सुख की आकांक्षा करता हो। इस आकांक्षा की शक्ति दो भावनाओं पर निर्भर है – “संवेग” और “प्रसाद” (पाली में “पसाद”)। कम ही होंगे जिन्होंने बौद्ध संदर्भ में इन भावनाओं के बारे में सुना होगा, लेकिन वे इस परंपरा कि सबसे बुनियादी भावनाएँ हैं। युवा राजकुमार को बोधि की खोज करने के लिए इन भावनाओं ने प्रेरित तो किया; इतना ही नहीं, बल्कि भगवान बुद्ध ने, बोधि प्राप्त करने के बाद, अपने शिष्यों को दैनिक इन भावनाओं को विकसित करने का निर्देश दिया। वास्तव में, संवेग और प्रसाद को उनका समझाने का ढंग, शायद आधुनिक काल के लिए उनके सबसे महत्वपूर्ण योगदानों में से एक होगा।

युवा राजकुमार सिद्धार्थ ने पहली बार बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु को देखकर मन में जो महसूस किया, उसे “संवेग” कहते हैं। हिन्दी में “संवेग” एक घबराहट भरे और जोशीले वेग को कहते हैं। बौद्ध संदर्भ में, संवेग में तीन तरह की भावनाएं मिश्रित हैं। पहली – निराशा, भय और अकेलेपन की भावना, जब समझ आ जाए कि सामान्य रूप से जीवन जीना कितना निरर्थक होता है; दूसरी – एक दंडात्मक एहसास कि ऐसे अंधाधुंध जीने में हमारी मिलीभगत, आत्मसंतुष्टि और मूर्खता का बड़ा योगदान है; और, तीसरी – बेचैनी की भावना, जब इस अर्थहीन चक्र से बाहर निकलने की इच्छा मन में चुभे।

बड़े होते-होते, हम सब ने इन भावनाओं को कभी-न-कभी तो महसूस किया ही होगा, मगर आमतौर पर हमारा इनसे निपटने का ढंग बड़ा अकुशल होता है। संवेग की भावनाएँ आधुनिक संस्कृति में खतरनाक मानी जाती हैं, मगर बौद्ध धर्म इन्हें संभालने की हमें एक प्रभावशाली रणनीति सिखाता है।

बेशक, केवल हमारा ही ज़माना नहीं जिसे संवेग में खतरा दिखता है। राजकुमार सिद्धार्थ की कहानी में उनके पिता की प्रतिक्रिया यही दर्शाती है कि अधिकांश समाज इन भावनाओं से कैसे निपटते हैं। पिता ने राजकुमार को समझाने का प्रयत्न किया कि वह एक असंभव प्रकार का सुख ढूंढ रहा है। उसका ध्यान भटकाने के लिए, पिता ने उसे संबंधों और कामुक सुखों में मग्न रखने की कोशिश की। उन्होंने राजकुमार के लिए एक आदर्श रिश्ता तय किया, हर मौसम के लिए एक अलग महल बनवाया, बेहतरीन कपड़े और प्रसाधन प्रदान किए, मनोरंजन का निरंतर प्रदर्शन चालू रखा, और नौकरों की तनख्वाह अच्छी-खासी रखी ताकि वे राजकुमार की हर चाहत को मुस्कुराते हुए पूरी कर सकें।

यानी कि, पिता की रणनीति थी कि वे राजकुमार को अपना लक्ष्य छोटा करने के लिए मना लें, कि वह एक आधे-अधूरे, कच्चे-पक्के सुख से समझौता करने के लिए राजी हो जाए। यदि युवा राजकुमार आज जीवित होते, तो उनकी असंतुष्टि का समाधान करने के लिए उनके पिता के पास और भी साधन होते, जैसे कि मनोचिकित्सा या साधना-शिविर। लेकिन मूल युक्ति वही रहती – राजकुमार का ध्यान भटकाना और उसकी संवेदनशीलता घटाना, ताकि वह शांत हो जाए और समाज का एक संतुष्ट, लाभदायक नागरिक बन सके।

सौभाग्य से, राजकुमार ऐसी तरकीब के आगे झुकने के लिए कुछ ज़्यादा ही गरुड़-नेत्र और शेर-दिल वाले थे। और भी सौभाग्य से, उनके पैदाइश समाज प्राचीन भारत में, अवसर उपलब्ध था जिससे वह अपने हृदय के सत्यों की क़दर करते हुए अपने संवेग का समाधान खोज पाए।

उस समाधान का पहला कदम कहानी में उस चौथे व्यक्ति द्वारा दर्शाया गया है जिसको राजकुमार अपनी यात्रा पर मिलते हैं – एक घूमता-फिरता सन्न्यासी। गृहस्थ जीवन के सीमित, धूल-भरे रास्ते की तुलना में, राजकुमार ने सन्न्यास की स्वतंत्रता को खुली हवा के रूप में देखा। अपने जीवन-मृत्यु वाले प्रश्नों के उत्तर ढूंढने, और अपने उच्चतम आदर्शों के अनुसार, “एक चमकते शंख जैसे निर्मल” जीवन जीने का अवसर उन्होंने सन्न्यास के स्वतंत्र मार्ग में देखा।

इस समय जो भावना उन्होंने महसूस की, उसे “प्रसाद” (पाली में “पसाद”) कहते हैं। आजकल तो “प्रसाद” मंदिर में मिलने वाली मिठाई को कहते हैं, मगर असल में इस शब्द का मूल अर्थ है “कृपा”। बौद्ध संदर्भ में, संवेग की तरह प्रसाद में भी भावनाओं का एक जटिल समूह शामिल है। आमतौर पर इसे “स्पष्ट और शांत आत्मविश्वास” के रूप से समझाया जाता है। ये भावनाएं संवेग को निराशा में बदलने से रोकती हैं। राजकुमार सिद्धार्थ की कहानी में, उन्हें अपनी समस्या का स्पष्ट बोध हो गया, और विश्वास हो गया कि समाधान का रास्ता मिल गया है।

समस्या यह है कि जन्म, बुढ़ापे और मृत्यु का चक्र अर्थहीन ही है। प्राचीन बौद्ध सिद्धांत इस बात को नकारने की कोशिश नहीं करता, और इसलिए हमें स्वयं के प्रति झूठा या अस्तित्व के प्रति अंधा होना नहीं सिखाता। जैसे कि एक बौद्ध आचार्य ने कहा है, दुख की वास्तविकता को स्वीकार करना बौद्ध मान्यता का एक उपहार है, इतना महत्वपूर्ण कि दुख को पहले आर्य सत्य के रूप में सम्मानित किया गया है। यह शिक्षण हमारे प्रत्यक्ष और सबसे संवेदनशील अनुभव की पुष्टि करता है, एक ऐसा अनुभव जिसे कुछ अन्य परंपराएँ नकारने की कोशिश करती हैं।

इसके बाद, प्राचीन बौद्ध शिक्षण हमें अपनी संवेदनशीलता को और बढ़ाना सिखाता हैं, जब तक कि हम एहसास न कर लें कि दुख का असली कारण कहीं बाहर, समाज या किसी अन्य व्यक्ति में नहीं, बल्कि यहाँ भीतर, प्रत्येक व्यक्ति के मन में मौजूद तृष्णा में है। फिर पुष्टि करता है कि दुख का अंत वाकई में हो सकता है, कि चक्र से मुक्ति संभव है। और वह मुक्ति पाने का मार्ग दिखाता है, जिस पर चला जाता है मन के छिपे आर्य गुणों को विकसित करके, जब तक कि मन तृष्णा को त्याग न दे और अमरता को खुल न जाए। इस प्रकार, समस्या का एक व्यावहारिक समाधान है जो हर व्यक्ति को उपलब्ध है।

यह एक ऐसा समाधान है जो जांच-परीक्षण के लिए भी खुला है। यह बात बुद्ध के संवेग से निपटने में उनके आत्मविश्वास का संकेत है। जो लोग यह सुनकर थक चुके हैं कि उन्हें अपनी संवेग-प्रेरणात्मक अनुभूतियों को नकारने चाहिए, उनके लिए यह बौद्ध धर्म के सबसे आकर्षक पहलुओं में से एक है।

वास्तव में, बौद्धों को इतना पक्का विश्वास है कि वे संवेग को संभालते ही नहीं, बल्कि उसको पूरी तरह विकसित भी करते हैं। जीवन की समस्याओं का यह समाधान ऐसा समर्पित प्रयास मांगता है कि केवल तीव्र संवेग ही साधक को अपनी पुरानी आदतों पर लौटने से रोक सकता है। इसलिए संवेग का विकास करने के लिए सभी को, चाहे दीक्षित हों या न, प्रतिदिन बुढ़ापे, बीमारी, जुदाई और मृत्यु के तथ्यों पर चिंतन करने की सलाह दी जाती है। और इसके साथ, संवेग को एक कदम आगे, प्रसाद तक ले जाने के लिए, अपने कर्मों की शक्ति पर चिंतन करना सिखाया जाता है।

जिनका संवेग इतना तीव्र हो जाता है कि वे दुख-समाप्ति के मार्ग में समाज के हर बाधक बंधन को त्यागना चाहते हों, उनके लिए बौद्ध धर्म एक समय-सिद्ध विद्या का कोष प्रदान करता है, और साथ ही एक सुरक्षा जाल भी – जो है भिक्षु संघ। यह संस्था उन्हें, गृहस्थों के दान के आधार पर, भौतिक अस्तित्व के बारे में निश्चिंत रहकर, सामान्य समाज छोड़ने का मौका देती है। जो उपासक अपने सामाजिक संबंधों को छोड़ नहीं सकते, उन्हें बौद्ध धर्म दुनिया की समस्याओं में डूबे बगैर दुनिया में जीने का उपाय देता है – दान-उदारता, शील-सदाचार और ध्यान-प्रज्ञा के मार्ग पर चलते-चलते, मन के आर्य गुणों को प्रबल करते हुए, दुख के अंत की ओर ले जाता है। भिक्षु संघ और उपासक समूह – बौद्ध परिषद की इन दो शाखाओं के बीच यह गहरा और मंगलकारी संबंध यह दिलासा देता है कि सन्न्यासी अजीब मानवद्वेषी न बन जाएं, और उपासक अपनी साधना के आधारभूत मूल्यों से संपर्क न खोएं।

इसलिए, जीवन के प्रति बौद्ध दृष्टि संवेग को जगाती है, यानी कि जन्म, बुढ़ापे और मृत्यु के चक्र की निरर्थकता का एक तीव्र बोध, और इसे प्रसाद में विकसित करती है, यानी कि अमरता की ओर जाने वाला एक निडर मार्ग। इस मार्ग में शामिल हैं समय-सिद्ध मार्गदर्शन, और एक सामाजिक संस्था जो इस दर्शन को जीवित और पोषित रखती है। ऐसी बातों कि हमें और हमारे समाज को बहुत ज़रूरत है। जब हम आज़माते हैं कि आधुनिक जीवन की मुख्यधारा को बौद्ध धर्म क्या प्रदान करता है, तो हमें याद रखना चाहिए कि मुख्यधारा से एक पैर बाहर रखने की क्षमता ही इस धर्म की ताकत का एक स्रोत है। और तो और, धारा को पार करके दूसरे तट तक जाना, इस साधना का एक पारंपरिक प्रतीक है।