शून्यता क्या है?
“शून्यता” एक प्रकार के नज़रिए को कहते हैं। अपने अनुभव को देखने का यह एक विशेष ढंग है, जहां शारीरिक और मानसिक घटनाओं के “कच्चे” अनुभव में न तो कुछ डाला जाता है, न कुछ हटाया। मन और इन्द्रियों में जो कुछ घट रहा है, उसे जाना जाता है, बिना विचारे कि इन घटनाओं के पीछे कुछ मौजूद है या नहीं।
इस नजरिए को शून्य कहते हैं क्योंकि इसमें हम अपनी कोई पूर्वधारणा नहीं डाल रहे। आम तौर पर, अपने अनुभव को समझने के लिए हम हमेशा कोई धारणाएं लेकर आते हैं – कहानियां और मान्यताएं जिनके ज़रिए हम स्वयं को समझते हैं और अपनी दुनिया को परिभाषित करते हैं। हालांकि इन कहानियों और मान्यताओं का कहीं सदुपयोग भी हो सकता है, भगवान बुद्ध ने पाया कि इनसे उत्पन्न होने वाले कुछ ऊंचे-ऊंचे अमूर्त प्रश्न – जैसे कि अपनी असली पहचान, अपनी आत्मा का स्वभाव, और बाहरी दुनिया का अस्तित्व – हमें वर्तमान के प्रत्यक्ष अनुभव से भटका देते हैं। फिर हम यह समझ नहीं पाते कि तत्कालीन घटनाएं एक दूसरे पर कैसा प्रभाव कर रही हैं, और इस कारण, दुख को समझने और उससे मुक्त होने से वंचित रह जाते हैं।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि ध्यान करते समय तुम्हें अपनी मां के प्रति क्रोध की भावना महसूस होती है। उसी क्षण, मन प्रतिक्रिया करता है और उस क्रोध को अपना लेता है – “मेरा क्रोध” या “मुझे क्रोध आया है।” फिर उस भावना की व्याख्या करता है, या तो तुम्हारी मां के साथ तुम्हारे रिश्ते की कहानी में जोड़कर, या विचार करके कि कब और किस स्थिति में मां के प्रति क्रोध जायज़ हो सकता है।
बुद्ध की दृष्टि से, इस सब में समस्या यह है कि इन सारी बातों से बहुत दुख उत्पन्न होता है। जितना तुम इनमें घुसोगे, उतना ही दुख के असली कारण से भटकते जाओगे – जो है ये “मैं, मेरा” का थोप जिससे पूरी प्रक्रिया शुरू हुई। परिणामस्वरूप, तुम इस कारण को हटाने का उपाय नहीं ढूंढ पाओगे जिससे दुख समाप्त हो जाए।
पर यदि तुम क्रोध जागने पर शून्यता की मानसिक स्थिति अपना पाओ, बिना कोई प्रतिक्रिया किए, बिना उसे कोई बाहरी संदर्भ में डाले, बस उसे एक घटनाओं की श्रृंखला के रूप में देखकर, तो तुम देख पाओगे कि उस क्रोध में इस लायक कुछ भी नहीं जिसे तुम अपनाना चाहो। इस प्रकार, वह शून्य है। जैसे–जैसे तुम शून्यता के दृष्टिकोण को कायम रखना सीखते हो, पाओगे कि यह सत्य केवल क्रोध जैसी स्थूल भावनाओं पर ही नहीं, बल्कि संसार-जगत के सूक्ष्मतम अनुभवों पर भी लागू होता है। इस अर्थ में, सब कुछ शून्य है। इस बात को जानकर बोध होता है कि “मैं, मेरा” का थोप अनुचित है, अनावश्यक है, और केवल दुख ही जन्मता है। अब उसे त्याग दिया जा सकता है। जब पूरी तरह से त्याग दिया जाए, तब उस शून्य दृष्टिकोण से भी गहरा अनुभव होता है, परिपूर्ण मुक्ति का।
ऐसे शून्य नज़रिए में कुशल बनने के लिए शील, समाधि और प्रज्ञा में कड़े प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। नहीं तो, मन अपने पुराने नज़रिए में ही कैद रहता है – स्वयं और विश्व के बारे में कहानियां बनाने वाले में। और इस नज़रिए से देखें तो शून्यता की शिक्षा एक और कहानी लगती है, बस नए नियमों के साथ। तुम्हारी मां के साथ तुम्हारे रिश्ते के संदर्भ में, ऐसा लगता है कि शून्यता का मतलब यह कि वास्तव में न कोई तुम हो, न कोई मां। तुम्हारी विश्वदृष्टि के संदर्भ में, ऐसा लगता है कि शून्यता का मतलब या तो यह कि विश्व है ही नहीं, या यह कि शून्यता पूरे लोक के कोई महान, अद्वैत अस्तित्व का आधार है, जिससे हम सब उत्पन्न हुए हैं और जिसमें एक दिन सब लौट जाएंगे।
ये व्याख्याएं शून्यता का केवल अर्थ ही नहीं समझतीं, बल्कि मन को सही दृष्टिकोण अपनाने से भी रोकती हैं। अगर तुम्हारी जीवनकथा की दुनिया और उसके लोग सच में हैं ही नहीं, तो उस कथा की सारी क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं बस शून्यों के गणित जैसी लगती हैं, और मन सोचने लगता है कि शील पालन करने का फ़ायदा ही क्या? वहीं दूसरी ओर, अगर शून्यता को पूरे अस्तित्व के आधार के रूप में देखें, जिस में हम सब एक दिन समा जाएंगे, तो समाधि और प्रज्ञा में प्रशिक्षण लेने की क्या ज़रूरत है, क्योंकि आखिरकार हम वहां पहुंच ही जाएंगे? और अगर वहां पहुंचने के लिए प्रशिक्षण की ज़रूरत भी हो, कौन कह सकता है कि हम वहां से वापस बाहर निकलकर दुख में फिर डूब नहीं जाएंगे? तो इन सारी परिस्थितियों में मन को प्रशिक्षित करने का उपाय ही व्यर्थ लगता है। अनुभव के पीछे कुछ मौजूद है या नहीं, इस प्रश्न पर ध्यान देने से मन ऐसी बातों में उलझ जाता है जो उसे वर्तमान का नज़रिया अपनाने नहीं देती।
ऐसा नहीं है कि कहानी और विश्वदृष्टि हमेशा बुरी बात है। लोगों को धर्म सिखाने के लिए बुद्ध भी इनका उपयोग करते थे, मगर इस दौरान वे “शून्यता” शब्द का कभी इस्तेमाल नहीं करते थे। वे लोगों की जीवनकथा सुनाकर ज़ाहिर करते थे कि कैसे उन लोगों के कर्मों के पीछे अकुशल धारणाओं की वजह से उनके दुख उत्पन्न हुए, और कैसे वे और संवेदनशील बनकर दुख से छुटकारा पा पाए। और बुद्ध संसार चक्र के मूलभूत सिद्धांतों की भी व्याख्या करते थे, जिसे विश्वदृष्टि माना जाएगा। उन सिद्धांतों से पता चलता है कि बुरे इरादों के कर्म दुखद जन्म की ओर लेकर जाते हैं, और नेक इरादों के कर्म सुखद, और तो और, सबसे कुशल कर्म पुनर्जन्म के चक्र से ही परे ले जाते हैं। इन सारी परिस्थितियों में उनकी शिक्षा का उद्देश्य था लोगों को उत्साहित करना कि वे वर्तमान में अपने इरादों और धारणाओं की गुणवत्ता पर ध्यान दें – यानी कि, वे शून्य दृष्टिकोण अपनाने के लिए उत्साहित हो जाएं। वहां पहुंचकर, वे शून्यता की शिक्षा का सही उपयोग कर सकते हैं – सभी दृष्टियों, कहानियों, और मान्यताओं के लगाव को शून्य कर देना, जिससे मन का राग, द्वेष और मोह पूरी तरह से शून्य हो जाता है, यानी कि, हर प्रकार का दुख शून्य हो जाता है। अंत में, केवल यही शून्यता सच में मायने रखती है।




