स्मृति और समाधि का मार्ग
अक्सर लोग कहते हैं कि बुद्ध दो प्रकार के ध्यान प्रयोग सिखाए – एक स्मृति (पाली में “सति”) वाला और एक समाधि वाला। कहते हैं कि स्मृति वाला प्रयोग सीधा रास्ता है, और समाधि वाला, सुंदर मगर घूमता-फिरता मार्ग है, जिसमें भटकने और अटकने का खतरा है। पर अगर हम देखें कि बुद्ध ने सच में क्या सिखाया, तो पता चलता है कि वे इन साधनाओं को ऐसे अलग नहीं करते। दोनों एक ही साधना के अंग हैं। जब भी वे स्मृति की व्याख्या करते हैं, और उसका मार्ग में महत्व समझाते हैं, वे साफ़-साफ़ कहते हैं कि सम्यक स्मृति का उद्देश्य है मन को सम्यक समाधि में ले जाना – मन को इस प्रकार स्थिर करना कि वह शांति और आराम महसूस कर सके, जहां वह गौर से और लंबे समय तक निरीक्षण कर सके, ताकि घटनाओं को वैसे जान पाए जैसी वे सच में हैं।
यह “दो साधनाओं” का मुद्दा काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर है कि हम पाली शब्द “झान” को कैसे समझते हैं। पाली में “ध्यान” को “झान” कहते हैं, और सम्यक समाधि की परिभाषा हमेशा “चार झानों,” यानी कि चार प्रकार के ध्यानों से की जाती है। हम सुनते आ रहे हैं कि झान के लिए बड़ी तीव्रता से घूरना होता है, जब तक कि बाहरी दुनिया का पूरा सुध-बुध खो दें। यह व्याख्या बिल्कुल भी सम्यक स्मृति जैसी नहीं लगती, जिसमें वर्तमान क्षण (के अपने कर्मों) के प्रति सचेत रहना सिखाया जाता है। पर अगर हम भगवान बुद्ध की झान की व्याख्या देखें, तो पाएंगे कि वह ऐसी दबी हुई मनोस्थिति की बात नहीं कर रहे। झान में होने का अर्थ है बड़े सुखद रूप से पूरे शरीर के अनुभव में मग्न होना। एक विशाल, फैली हुई चेतना का आभास पूरे शरीर को भर लेता है। बुद्ध इसका वर्णन ऐसे करते हैं – एक आटे का गोला जिसे कोई गूंथ रहा हो ताकि उसमें पानी पूरी तरह से विसर्जित हो जाए मगर बाहर न चूए। या, स्रोत से भरा तालाब जहां स्रोत का शीतल जल उभर-उभर कर पूरे तालाब को भर रहा है।
अब, जब हम पूरे शरीर के अनुभव पर ध्यान करते हैं, तब हम वर्तमान क्षण में ही उपस्थित रहते हैं। चौथे झान में शरीर में उज्ज्वल चेतना भर जाती है, और इस अवस्था में ही बुद्ध कहते हैं कि स्मृति और समता परिशुद्ध होते हैं। तो स्मृति और सजगता का अभ्यास, और संपूर्ण शरीर की स्थिर, शांतिपूर्ण चेतना – इन दोनों साधनाओं को साथ-साथ करने में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। वास्तव में, बुद्ध भी इन्हें जोड़कर ही सिखाते हैं, जैसे आनापानसति (आते-जाते सांस का ध्यान) के पहले चार चरणों में – १) लंबी सांसों को जानना, २) छोटी सांसों को जानना, ३) सांस लेते और छोड़ते समय पूरे शरीर को महसूस करना, ४) शरीर में सांस का अनुभव शांत होने देना। जैसे कि सुत्रों से पता चलता है, यह एक मूलभूत स्मृति प्रयोग है। साथ ही यह समाधि प्रयोग भी है। इसके जरिए साधक सम्यक स्मृति का अभ्यास करते-करते सम्यक समाधि के पहले झान/ध्यान में प्रवेश करता है।
हम सतिपट्ठान सुत्त (स्मृत्युपस्थान सूत्र - मज्झिम निकाय १०) में स्मृति-साधना के तीन स्तरों को देखकर समझ सकते हैं कि सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि एक दूसरे की सहायता कैसे करते हैं। पहले तो सूत्र के नाम को जांचते हैं – स्मृति का उपस्थान, यानी कि अपनी स्मृति को उपस्थित करना, ताकि वह हाज़िर हो जाए, क्षण प्रति क्षण की आवश्यकता के अनुसार सही काम करने के लिए उपलब्ध हो जाए। कैसे? चार नींवों के आधार पर स्मृति को उपस्थित किया जाता है – शरीर, संवेदनाएं, मन, और मानसिक गुण। उदाहरण के लिए शरीर से शुरू करते हैं। स्मृति उपस्थान के पहले स्तर का कार्य है “शरीर में शरीर” पर ध्यान देते रहना, लौकिक लालच या बेचैनी को ठुकराते ठुकराते। इसका मतलब शरीर को सिर्फ एक शरीर के रूप में अनुभव करते रहना, बिना सोचे कि दुनिया में उसका क्या महत्व है। यदि सुंदर दिखता है या बदसूरत, ताकतवर है या कमज़ोर, फुर्तीला है या सुस्त, मोटा या पतला – लौकिक संदर्भ में शरीर की ये चिंताजनक बातें – बुद्ध कहते हैं कि उन्हें बस एक ओर रखा जाए।
केवल काया के संदर्भ में काया के साथ रहो। आंखें बंद करने पर क्या मौजूद है? तुम इस “कायत्व” की संवेदना, “कायत्व” के अनुभव के साथ बैठे हो। यह है हमारा आधारभूत संदर्भ – मतलब, जो कुछ भी अनुभव हो, उसे शरीर के साथ संबंधित करो, यानी कि शरीर के संदर्भ में उसे देखो। इस संदर्भ के साथ ही रहने की कोशिश करो। बार-बार मन को इस काया की संवेदना/अनुभव पर लौटाते रहो, जब तक कि मन शांत न हो जाए, स्थिर न हो जाए। शुरू-शुरू में पाओगे कि मन कभी कुछ पकड़ के निकला तो कभी कुछ और। ऐसा होने पर बस जान लो कि मन भटक गया है, उसे याद दिलाओ कि अभी तो शरीर के साथ रहना है, वापस शरीर को महसूस करो, और इस अनुभव को कायम रखो। फिर मन कुछ और पकड़ कर निकल पड़ता है, तो फिर उस बात को छोड़ो, वापस आओ, और शरीर से जुड़ जाओ। सांस को मज़बूती से थाम कर रखो। आखिरकार, तुम ऐसी अवस्था तक पहुंच जाओगे जहां मन सांस को पकड़ लेगा और छोड़ेगा नहीं। फिर यहां से, चेतना में और जो कुछ भी आए, वह ऐसा कि मानो अगर कुछ हाथ के पिछले हिस्से को छू कर निकल जाए। उस पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं। बस शरीर को आधारभूत संदर्भ बनाकर रखो। अन्य चीजें चेतना में आती हैं, जाती हैं, और तुम उनके प्रति सचेत रहते हो, मगर सांस छोड़कर उनका पीछा नहीं करते। इस अवस्था पर तुमने काया के आधार पर सबल स्मृत्युपस्थान कर लिया है – यानी, काया को संदर्भ के तौर पर खड़ा करके इसके संबंध में अपनी स्मृति और सजगता को उपस्थित कर लिया है।
ऐसा करने पर तीन मानसिक गुण विकसित हो रहे हैं –
पहली है स्मृति, यानी कि याद रखने की क्षमता, मन में कुछ कायम रखने की क्षमता। काया की स्मृति उपस्थित करने के समय, इसका मतलब यह याद रखना कि सब कुछ काया के संदर्भ में ही देखना है। खुद को भूलने नहीं देना। साथ में, काया पर ध्यान कैसे कायम रखते हैं, और अड़चनों को कैसे ठुकराते हैं – इसके बारे में जो जो दूसरों से सीखा है, और अपनी साधना से भी, उसे याद रखना।
दूसरा मानसिक गुण है सजगता (पाली में “संपजञ्ञा”, संस्कृत में “संप्रजन्य”)। मतलब वास्तव में तुम वर्तमान में कर क्या रहे हो, उसके प्रति सजग रहना। क्या ध्यान शरीर पर ही है? सांस पर है? कैसा परिणाम मिल रहा है? क्या सांस आरामदायक है या नहीं? अक्सर हम “स्मृति/सति” का अर्थ “सजगता” ही ले लेते हैं, मगर वाकई में वे भिन्न हैं। स्मृति मन में याद रखती है कि ध्यान कहां लगाकर रखना चाहिए, और सजगता देखती रहती है कि वास्तव में किया क्या जा रहा है, और कैसा परिणाम मिल रहा है।
तीसरा मानसिक गुण है “उत्सुकता” या “लगन” जिसे पाली में कहते हैं “आतप्प,” संस्कृत में “आतपः।” यह है तपने की चाह, परिश्रम करने की चाह, सीखने की चाह। साधना में इसका मतलब, जिस क्षण पता लग जाए कि मन भटक गया है, उसे तुरंत वापस ले आएं। तुरंत। उसे इधर-उधर घूमने न दें। और जब मन उचित विषय पर स्थित हो जाए, “उत्सुकता” का मतलब बहुत करीबी से ध्यान देना। जो घट रहा है, उसके प्रति तुम जितना संवेदनशील हो पाओ, उतना बनने की कोशिश करना। वर्तमान में बस बह नहीं जाना, बल्कि गहराई से मन या सांस की सूक्ष्मतम घटनाओं को समझने का प्रयास करना।
जब इन तीन गुणों को लेकर तुम काया के संदर्भ में काया पर ध्यान देते हो, तो मन निश्चित रूप से शांत और स्थिर हो जाता है, काया में बेहद आराम महसूस करते हुए वर्तमान में उपस्थित हो जाता है। अब तुम साधना के दूसरे स्तर के लिए तैयार हो गए हो – उदय और व्यय की घटनाओं को जानना। इस स्तर पर तुम वर्तमान काल में कारण और परिणाम को समझने की कोशिश करोगे।
समाधि के स्तर पर, मन को स्थिर करने के बाद हम समाधि की प्रक्रिया में कारण और परिणाम को समझना चाहते हैं, ताकि हम समाधि में कुशल हो जाएं, ताकि मन को भिन्न-भिन्न प्रकार की परिस्थितियों में और लंबे समय तक, स्थिर रख पाएं। ऐसा करने के लिए, हमें सीखना होगा कि मन में घटनाएं कैसे उत्पन्न होती हैं और कैसे समाप्त, केवल उनको देख देखकर नहीं, बल्कि उनकी उत्पत्ति और समाप्ति में भाग लेकर।
ध्यान में अड़चनों से निपटने के निर्देश पढ़कर यह बात समझ आती है। पहले स्तर में बुद्ध कहते हैं कि अड़चनों के आवागमन के प्रति सचेत रहो। कुछ लोग मानते हैं कि यह एक “निर्विकल्प ध्यान” की साधना है, जिस में मन का कोई नियंत्रण करने की कोशिश नहीं की जाती, और जो कुछ भी चेतना में प्रवेश करता है, उसे बस बैठके देखा जाता है। असल में, इस स्तर पर मन ऐसी साधना के लिए तैयार नहीं है। वाकई में, इस स्तर पर एक स्थिर स्थान की ज़रूरत है जिसके आधार पर मन की घटनाओं का मूल्यांकन किया जा सके। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि हम आकाश में बादलों की गति मापना चाहते हों। हमें किसी स्थिर स्थान को चुनना होगा, जैसे कोई छत का कोना या बिजली का खंभा, जिसे हम देखते रहें, ताकि जान पाएं कि बादल किस दिशा में किस रफ़्तार से जा रहे हैं। बिल्कुल वैसे ही, मन में कामुक राग, द्वेष, आदि का आना-जाना होता रहता है। हमें एक स्थिर स्थान कायम रखना होगा, जैसे कि सांस पर ध्यान, अगर हम सचमुच जानना चाहते हैं कि कब मन में अड़चनें उपस्थित होकर सांस के ध्यान में बाधा डाल रही हैं, और कब नहीं।
मान लीजिए कि क्रोध आकर तुम्हारी समाधि में दखल दे रहा है। क्रोध में घुसने के बजाय तुम केवल सचेत रह सकते हो, कि कब क्रोध मौजूद है और कब नहीं। क्रोध के आवागमन को सिर्फ़ एक घटना के स्तर पर जानो। मगर इतना ही नहीं। सांस पर ध्यान कायम रखते हुए, अगला कदम है यह समझना कि क्रोध को कैसे भंग किया जा सकता है। कभी-कभी केवल उसे देखना ही पर्याप्त होता है और वह पिघल जाता है, मगर कभी-कभी केवल देखना काफ़ी नहीं होता। उससे निपटने के लिए अन्य साधनों की जरूरत पड़ सकती है, जैसे कि क्रोध के पीछे के कारणों से तर्क-वितर्क करना, या क्रोध की हानि का स्मरण करना।
उससे निपटना हमेशा सुखद या आसान नहीं होगा – तुम्हें कठिन काम करने के लिए तैयार होना पड़ेगा। क्रोध किस कारण उत्पन्न हो रहा है, किस कारण समाप्त हो रहा है, और कैसे उसे दूर किया जाए, ये सब समझना होगा, क्योंकि तुम जानते हो कि क्रोध एक अकुशल मनोस्थिति है। ये सारे कार्य करने के लिए तुम्हें अलग-अलग प्रयोगों का प्रयास करना होगा। गर्व और बेसब्री को एक ओर रखके थोड़ी गलतियां करने कि जगह बनानी होगी। प्रयत्न करके अपनी गलतियों से सीखकर ही कुशलता प्राप्त होती है, और तुम क्रोध से निपटने में कुशलता ही तो चाहते हो। यहां क्रोध से घृणा करके उसे धकेलने, या क्रोध से प्रेम करके उसका स्वागत करने का सवाल नहीं है। ऐसी तरकीबें शायद छोटी अवधि में परिणाम दे ही दें, मगर लंबी अवधि में कुशल उपाय नहीं हैं। यहां उचित उपाय होगा यह पता लगाना कि क्रोध किन-किन अंशों से बना है, और इन्हें कैसे छिन्न-भिन्न किया जा सकता है।
जब क्रोध उपस्थित हो, और तुम्हें अन्य व्यक्तियों से बातचीत करने कि ज़रूरत न हो, तब एक प्रभावी तरकीब है बस खुद से बड़े स्नेहशील तरीके से पूछना, “अच्छा, तो गुस्से में क्यों हो?” अपने मन की बात को सुनो, और फिर आगे पूछो, “मगर इस बात पर गुस्से में क्यों हो?” “गुस्से में कैसे न होऊं? आखिरकार…” “अच्छा, मगर इस बात पर गुस्से में क्यों हो?” ऐसा करते-करते, अंत में मन कोई बेवकूफ-सी मूल बात बता ही देगा, जैसे कि यह मान्यता कि लोगों को अमुक तरह नहीं होना चाहिए, जब वे साफ़-साफ़ वैसे ही हैं, या कि लोगों को हमारे हिसाब से ही चलना चाहिए, या ऐसी कोई भी मान्यता इतनी फिजूल की कि मन उसे खुद से ही छुपाए बैठा है। पर अगर तुम कुरेदते जाओ, आखिरकार वह सच उगल ही देगा। ऐसा करने से तुम क्रोध को गहराई से समझना शुरू करोगे, और खुद पर उसकी शक्ति को काफ़ी हद तक घटाते जाओगे।
ऐसी ही प्रक्रिया से कुशल मानसिक स्थितियों को भी संभाला जाता है – जैसे स्मृति, शांति और समाधि। पहले तुम मन में उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति ज्ञात करते हो। फिर, बोध होता है कि अनुपस्थिति की तुलना में उनकी उपस्थिति कहीं ज़्यादा सुखद है। तो तुम समझने की कोशिश करते हो कि वे कैसे उत्पन्न होते हैं, कैसे बिखर जाते हैं। यह कैसे? तुम स्मृति और समाधि की स्थिति को स्थायी रखने के प्रयास से ऐसा करते हो। यह सारा खेल प्रेक्षक होने का है, यानी कि तेज़नज़र होने का, उन बातों पर ध्यान दे पाने का जिनके बारे में पहले बताया नहीं गया हो। अगर तुम सचमुच तेज़नज़र रहो, तो उस समाहित स्थिति को स्थायी रखने के कुशल ढंग पहचानने लगोगे। इस कार्य में सफलता या विफलता, दोनों से बिना घबराए, शांत चित्त हासिल करने में शांत चित्त की कामना को बाधा नहीं बनने दोगे। तुम बेशक सफलता चाहते हो, मगर सफलता और विफलता के प्रति एक संतुलित मनोभाव आवश्यक है, ताकि दोनों से सीख पाओ। कोई हिसाब नहीं रख रहा – हम अपनी समझ के लिए ही यह सब कर रहे हैं।
तो, ऐसे अपनी स्मृति को उपस्थित करना, या मन की घटनाओं के लिए एक संदर्भ स्थापित करना, “बस देखने” का कार्य नहीं है। बल्कि, उत्पाद और व्यय की प्रक्रिया में भाग लेने का कार्य है, प्रक्रिया के साथ सचमुच खेलने का कार्य है, ताकि अनुभव से सीख पाओ कि मन में कारण और परिणाम कैसे काम करते हैं।
यह ज्ञान बावर्ची के ज्ञान जैसा होता है। जैसे, तुम अण्डों के बारे में कुछ बातें तो उनको देखकर सीख सकते हैं, मगर बहुत कुछ नहीं। उनके बारे में सीखने के लिए उन्हें कड़ाही में डालकर उनका कुछ बनाना होगा। बनाते बनाते, अण्डों के अलग-अलग प्रकार, उन्हें पकाने के अलग-अलग ढंग, तलकर या उबालकर कैसे बनते हैं, तापमान का क्या असर होता है, इत्यादि, यह सब समझ में आने लगता है। तो अण्डे के साथ वास्तव में काम करके, उसका कुछ बनाने की कोशिश करके ही तुम उसे समझ सकते हो। मिट्टी के साथ भी ऐसा ही होता है। तुम सच में मिट्टी को नहीं जानते जब तक कि कुम्हार न बनकर मिट्टी से कुछ बनाने की कोशिश न करते।
और मन के साथ भी ऐसा ही होता है। जब तक कि तुम मन का कुछ बनाने का प्रयत्न नहीं करते, एक मनोस्थिति को शुरू करने और बरकरार रखने का प्रयत्न नहीं करते, तब तक अपने मन को जानते ही नहीं। मन में कारण और प्रभाव की प्रक्रिया को जानते ही नहीं। स्वयं प्रक्रिया में भाग लेने का कुछ आभास होना चाहिए। फिर ही समझ में आएगा।
यह सारी बातें बस तेज़नज़र होने और कौशल बढ़ाने पर आ जाती हैं। कौशल बढ़ाने का सार तीन बातों में आ जाता है। पहली बात – परिस्थिति जैसी है, उसे जानना। दूसरी बात – उसमें अपनी ओर से क्या डाला जा रहा है, उसे जानना। तीसरी बात – परिणाम को जांचना।
जब बुद्ध कारण और प्रभाव की प्रक्रिया की बात करते हैं, वे कहते हैं कि हर परिस्थिति दो प्रकार के कारणों से प्रभावित होती है – कारण जो अतीत में किए गए थे, और कारण जो हम वर्तमान में कर रहे हैं। तुम्हें दोनों के प्रति सजग रहना होगा। अगर तुम परिस्थिति में अपने योगदान के प्रति सचेत नहीं हो, तो कोई भी कौशल विकसित नहीं कर पाओगे। अपने योगदान के साथ-साथ, परिणाम पर भी ध्यान देना होगा। अगर कुछ गड़बड़ हो रही हो, वापस मुड़कर अपना कार्य बदलना होगा, जब तक कि इच्छित फल प्राप्त न हो जाए। और ऐसा करते-करते, तुम पदार्थ से खूब सीखोगे, चाहे वह मिट्टी हो या अण्डे, या जो कुछ भी जिस में कुशलता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हो।
यह बात मन पर भी लागू होती है। ज़ाहिर है, मन को किसी भी तरह की स्थिति में लाने के प्रयास से तुम कुछ न कुछ तो सीखोगे ही, मगर सचमुच तीक्ष्ण बोध के लिए एक स्थिर, संतुलित, स्मृति युक्त, सजग समाधि की स्थिति सर्वोत्तम उपाय है। मन के स्थिर हो जाने पर जो आनंद और सुख मिलता है, उनके ज़रिए मन आराम से वर्तमान क्षण में स्थायी रह पाता है। जब मन पक्के रूप से स्थिर हो जाए, तब उसका लंबे समय तक निरीक्षण करना संभव हो जाता है। इससे, हर घटना को गौर से जाना जा सकता है, कि वह किन-किन तत्वों से बनी है। साधारण, असंतुलित मानसिक स्थिति में घटनाएं इतनी तेज़ी से उत्पन्न और समाप्त होती हैं कि उन्हें स्पष्ट रूप से देखा नहीं जा सकता। मगर जैसे बुद्ध कहते हैं, यदि तुम झान/ध्यान में कुशलता प्राप्त कर लो, तो थोड़ा पीछे हटकर मन को देख सकते हो कि वाकई में हो क्या रहा है। जैसे, तुम देख सकते हो कि कहां कोई आसक्ति का तत्व है, कहां दुख का, यहां तक कि अपनी संतुलित मनोस्थिति में भी कहां कोई अस्थिरता का तत्व है। अब बोध होना शुरू हो जाता है, जब मन के अलग-अलग तत्वों के बीच की प्राकृतिक सीमाएं स्पष्ट होने लगती हैं, खास तौर पर, चेतना और उसके विषयों के बीच की सीमा।
इस सजग, स्थिर, समाहित स्थिति का एक और लाभ है। इसमें मन को बार-बार स्थित करके जैसे-जैसे यही स्थिति सुखदायी, सुरक्षित, सही और प्रिय लगने लगती है, वैसे-वैसे एहसास होने लगता है कि सुख, शांति, यहां तक कि आनंद भी अपने भीतर ही उपलब्ध हैं। इन्हें पाने के लिए बाहरी दुनिया से कुछ भी नहीं चाहिए – अन्य लोग, संबंध, दूसरों से स्वीकृति, या ऐसी कोई भी बात जो बाहरी दुनिया पर निर्भर हो। इस बोध के आधार पर बाहरी आसक्तियां छूटने लगती हैं। कुछ लोग शांत मनोस्थिति से आसक्ति करने से डरते हैं, पर वास्तव में, यहां आसक्त होना बहुत ज़रूरी है, ताकि मन ठहरने लग जाए और बाकी आसक्तियों को त्यागना शुरू कर पाए। जब मात्र इस शांति के प्रति आसक्ति ही रह जाए, तभी इसे त्यागने का प्रयास शुरू करना चाहिए।
प्रज्ञा जगाने में सबल समाधि की आवश्यकता एक और कारण से स्पष्ट होती है। प्रज्ञा की मूलभूत सीख होती है तुम्हें अपनी ही मूर्खता दिखाना। तुम उन बातों को पकड़े बैठे हो जो, अंदर ही अंदर, तुम जानते हो कि व्यर्थ हैं। अब, किसी भूखे, थके हुए व्यक्ति को ऐसा कहकर देखो। फट से जवाब मिलेगा, “मूर्ख होगे तुम!” बात इधर ही समाप्त हो जाएगी और कुछ हासिल नहीं होगा। मगर यदि कोई भर-पेट भोजन और विश्राम कर चुका हो, तो उसके साथ किसी भी विषय पर, बिना डरे चर्चा की जा सकती है। मन के साथ भी ऐसा ही होता है। जब ध्यान-जनित सुख और आनंद से वह भरपूर पोषित हो जाए, तब सीखने के लिए तैयार हो जाता है। फिर वह बिना खतरा महसूस किए, अपनी गुण-दोष की आलोचना स्वीकार करने के लिए राजी हो जाता है।
तो। समाधि साधना का स्मृति उपस्थान के दूसरे स्तर में यही पात्र है। तुम्हें कुछ खेलने के लिए देती है जिसके जरिए तुम कौशल विकसित कर सको, ताकि मन में कारण-प्रभाव की प्रक्रियाओं को समझना शुरू कर पाओ। तुम्हें दिखना शुरू हो जाता है कि मन सिर्फ कारणों का प्रवाह है, जिनके नतीजे मुड़कर तुम पर ही असर करते हैं। तुम्हारे विचार, तुम्हारी भावनाएं, यहां तक कि तुम्हारी अपनी पहचान का अहसास भी इस प्रवाह में शामिल है। इस बोध के ज़रिए, इस पूरी प्रक्रिया के प्रति आसक्ति ढीली होने लगती है।
अंत में, मन स्मृति उपस्थान के तीसरे स्तर पर पहुंचता है – एक उत्तम संतुलन की स्थिति, जहां समाधि को इस हद तक विकसित कर लिया है कि इसमें और कुछ करने को बाकी नहीं है। स्मृति उपस्थान सूत्र में इस स्तर का वर्णन केवल ऐसे किया गया है – यदि शरीर को अपना आधारभूत संदर्भ माना हो, तो बस इतना जानते रहना कि “शरीर है,” स्मृति और ज्ञान को उपस्थित करने के लिए, दुनिया की हर चीज़ से अनासक्त रहकर। दूसरे सूत्रों में इस स्थिति को कहा गया है “अनिर्माण,” पाली में “अतम्मयता = अ+तम्+मय+ता” यानी “नहीं-उसका-बना-हुआ-ता।” इस मनोस्थिति में समझ आने लगता है कि मन में हर प्रकार की प्रक्रिया – यहां तक कि समाधि और प्रज्ञा भी – चिपचिपे लेप के जाल जैसी होती हैं। उन्हें अपने पास खींचते हो तो अटक जाते हो, उन्हें दूर धकेलते हो तो अटक जाते हो। तो अब क्या किया जाए? उस अवस्था तक पहुंचना होगा जहां वर्तमान क्षण में अपनी ओर से तुम कुछ भी नहीं डालो। उसमें अपनी भागीदारी को समाप्त होने देना होगा। फिर मन में कुछ खुल जाता है।
अक्सर लोग इसी स्तर से प्रारंभ करना चाहते हैं – शुरू में ही वर्तमान में कुछ न डालने का प्रयास करते हैं, मगर यह काम नहीं करता। मन अपनी आदत से वर्तमान में जो सूक्ष्म कार्य करता आ रहा है, उनके प्रति संवेदनशील होना तभी संभव होगा जब तुम जानबूझकर अपने वर्तमान कार्यों को बदलने की कोशिश करोगे। कुशलता प्राप्त करते करते, तुम उन सूक्ष्म कार्यों के प्रति संवेदनशील होने लगते हो, जिनका तुम्हें एहसास भी नहीं था। चित्त एक मोहभंग की स्थिति में पहुंचता है। पता चलता है कि वर्तमान से निपटने का सबसे कुशल ढंग होगा उसमें पूरी तरह से अपनी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, अशांति-जनक भागीदारी भी समाप्त होने देना। साधना के दूसरे स्तर में जो कुछ भी करने को सीखा था, अब तुम उसका भी विखंडन करना शुरू कर देता हो, जब तक कि संतुलन अपने आप आ जाए, मन सब कुछ त्याग दे, और विमुक्ति को उपलब्ध हो जाए।
तो यह समझना ज़रूरी है कि स्मृति उपस्थान साधना के तीन स्तर होते हैं, और समाधि का इनमें क्या पात्र है – पहले दो स्तरों में तुम्हारा कौशल बढ़ाकर, तुम्हें तीसरे स्तर तक पहुंचाना। यदि सम्यक समाधि (झान) को अंतरिम लक्ष्य नहीं लिया, तो तुम मन को समझने के लिए आवश्यक कौशल विकसित नहीं कर पाओगे, क्योंकि सजग समाधि में निपुणता प्राप्त करने में ही सच्चा बोध मिलता है। जैसे तुम किसी पशु के झुण्ड को सच में नहीं समझते जब तक कि पशुओं को खुद न चराओ, हर कदम अपनी भूलों से सीखते-सीखते, वैसे ही, मन से गुजरती सभी कारण-और-प्रभाव की धाराओं को तुम नहीं समझते, जब तक कि उन्हें समाहित, सजग, और स्मृति-युक्त समाधि में एकाग्र नहीं करते, हर कदम अपनी भूलों और सफलताओं से सीखते सीखते। कौन सी हैं ये धाराएं? तृष्णा की धाराएं, जिनसे दुख पैदा होता है, और स्मृति और समाधि की धाराएं, जिनसे दुख समाप्ति का मार्ग बनता है। केवल जब इन धाराओं को तुम पूरी तरह से समझ लो, इनमें पूरी तरह से निपुण हो जाओ, कि तुम इन्हें त्याग कर सच्ची मुक्ति पा सकते हो।




