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साधना में विपश्यना की भूमिका

विपश्यना वास्तव में क्या है?

प्राचीन बौद्ध साधना पर लगभग सभी वर्णन कहते हैं कि बुद्ध ने दो प्रकार की साधनाएं सिखाईं थीं – शमथ और विपश्यना। “शमथ” का अर्थ है “शांति,” और सुनने में आता है कि यह गहरी और शक्तिशाली समाधि (“झान”) लगाने का प्रयोग है। विपश्यना का मूल अर्थ है “विषेश रूप से देखना।” इसे हम एक दूसरी ध्यान विधि के नाम से जानते हैं, और सुनने में आता है कि यह थोड़ी-सी समाधि का उपयोग करके, क्षण-प्रति-क्षण होती घटनाओं की अनित्यता को अनुभूति के स्तर पर जानने का प्रयोग है। इस प्रयोग से घटनाओं के प्रति वैराग्य जागता है, जिसके ज़रिए मन सभी दुखों से मुक्ति पा लेता है। कहते हैं कि ये दोनों प्रयोग काफ़ी अलग हैं, और अध्यात्म के क्षेत्र में, विपश्यना ही भगवान बुद्ध का खास योगदान रहा है। बुद्ध से पहले भी लोग शमथ जानते थे, मगर बुद्ध ने विपश्यना खोज निकाली। बेशक कोई साधक शमथ की साधना विपश्यना करने से पहले करते भी होंगे, बोधि के लिए असल में शमथ आवश्यक नहीं। बोधि और प्रज्ञा के लिए विपश्यना पर्याप्त है।

ऐसा तो सुनने में आता है। मगर यह किस हद तक सही है?

यदि हम पाली सूत्रों में देखें, तो हालांकि वे शमथ का अर्थ “शांति” और विपश्यना का अर्थ “स्पष्ट दृष्टि” ही लेते हैं, इनके बारे में बाकी किसी भी प्रचलित मान्यता की पुष्टि नहीं करते। सूत्रों में “विपश्यना” शब्द भी अल्प मात्रा में मौजूद है, जबकि “झान” शब्द बार-बार दिखाई देता है। भगवान बुद्ध हमेशा कहते हैं कि “जाओ झान करो” अर्थात “जाओ ध्यान करो,” और ऐसा कभी नहीं कि “जाओ विपश्यना करो।” जब वे “विपश्यना” शब्द का उपयोग करते हैं, तब किसी ध्यान प्रयोग के बारे में बात नहीं कर रहे। “विपश्यना” का उल्लेख “शमथ” के साथ ही किया जाता है, जहां ये शब्द अलग-अलग ध्यान विधियों के नाम नहीं, बल्कि दो प्रकार के मानसिक गुण हैं, जिन्हें साधक प्राप्त कर सकता है, और जिन्हें इकट्ठे ही विकसित किया जाना चाहिए।

एक उपमा में (संयुक्त निकाय ३५:२०४), विपश्यना और शमथ की तुलना दो राजदूतों के साथ की गई है, जो शरीर के नगर में आर्य अष्टांगिक मार्ग से प्रवेश करते हैं और अपने सही संदेश, यानी कि निर्वाण, नगर के प्रधान, यानी कि चेतना, को पेश करते हैं।

एक और सूत्र, अंगुत्तर निकाय १०:७१, कहता है कि, जो व्यक्ति मानसिक क्लेश समाप्त करना चाहे, उसे शील में परिपूर्ण, एकांत पर समर्पित, शमथ पर दृढ़, और विपश्यना में संपन्न होना चाहिए। यह बात मामूली-सी लग सकती है, मगर उसी सूत्र में यही सलाह उन्हें दी जाती है जो चार झानों में निपुणता चाहते हैं – उन्हें भी शमथ पर दृढ़ और विपश्यना में संपन्न होना चाहिए। इससे प्रतीत होता है कि सूत्रों का संकलन करने वालों के अनुसार, शमथ, झान और विपश्यना एक ही मार्ग के अंग हैं। झान में कुशलता प्राप्त करने के लिए दोनों शमथ और विपश्यना की आवश्यकता है, और फिर झान के आधार पर शमथ और विपश्यना को और भी विकसित किया जाता है, ताकि वे मन के क्लेश समाप्त कर दें और उसे दुख से मुक्त कर सकें। ऐसा तात्पर्य अन्य सूत्रों से भी प्रतीत होता है।

उदाहरण के लिए एक और सूत्र – अंगुत्तर निकाय ४:१७०, तीन प्रकार के रास्तों का वर्णन करता है जहां शमथ और विपश्यना मिलकर काम करते हैं और बोधि के ज्ञान तक ले जाते हैं। या तो विपश्यना से पहले शमथ विकसित की जाती है, या शमथ से पहले विपश्यना, या दोनों इकट्ठे बढ़ाए जाते हैं। वर्णन में “बैल गाड़ी” का संकेत प्रतीत होता है – दो बैल अगर गाड़ी खींच रहे हों, या तो एक के पीछे एक बांधे जाते है, या दोनों साथ-साथ। एक और सूत्र, अंगुत्तर निकाय ४:९४ में बताया गया है कि यदि विपश्यना शमथ से ज्यादा बलवान हो जाए, या शमथ विपश्यना से, तो साधना असंतुलित है और उसे सुधारने की आवश्यकता है। ऐसा साधक जिसने थोड़ी शमथ प्राप्त कर ली है, मगर “उच्च प्रज्ञा के आधार पर घटनाओं में विपश्यना” (“अधिपञ्ञा-धम्म-विपस्सना”) नहीं, तो उसे विपश्यना में कुशल किसी सहयोगी से पूछना चाहिए – “संस्कारों (मन के इरादों, कर्मों, घटनाओं – मन में जोड़ने और बनाने की क्रियाओं) को कैसे समझना चाहिए? उनकी जांच कैसे करनी चाहिए? उन्हें स्पष्ट रूप से कैसे देखना चाहिए?” और फिर उस व्यक्ति की सलाह अनुसार विपश्यना बढ़ानी चाहिए। इन प्रश्नों के क्रिया शब्द – “समझना,” “जांच करना,” “देखना” – इनसे पता चलता है कि विपश्यना बढ़ाने के लिए केवल कोई ध्यान विधि पर्याप्त नहीं है। वास्तव में, हम देखेंगे कि ये क्रियाएं हमें खुद से एक कुशल प्रकार की पूछताछ करने में सहायता करती हैं, जिसे कहते हैं “उचित (विषय पर) ध्यान देना” (“योनिसो मनसिकार” = मन का उचित कार्य)।

विपरीत स्थिति, जहां साधक को घटनाओं में थोड़ी सी प्रज्ञा आधारित विपश्यना प्राप्त हो गई है, मगर शमथ नहीं। यहां उसे शमथ में कुशल व्यक्ति से पूछना चाहिए – “मन को स्थिर कैसे किया जाए? स्थापित कैसे किया जाए? एकाग्र कैसे किया जाए? समाहित कैसे किया जाए?” और फिर उस व्यक्ति की सलाह अनुसार शमथ बढ़ानी चाहिए। यहां जिन क्रियाओं का उपयोग किया है, उनसे प्रतीत होता है कि “शमथ” का इस संदर्भ में अर्थ है “झान,” क्योंकि ये वही क्रियाएं हैं जिनसे अन्य सूत्रों में बार-बार झान की व्याख्या की गई है – “मन स्थिर हो जाता है, स्थापित हो जाता है, एकाग्र और समाहित हो जाता है।” इस बात की पुष्टि एक और बात से होती है। यह प्रश्न कभी-कभी उठता है – मुक्ति के लिए जिस प्रज्ञा की ज़रूरत है, उस प्रज्ञा को जगाने के लिए कितनी समाधि पर्याप्त होती है? सूत्रों में जब भी इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर दिया गया है, वे कहते हैं कि समाधि का वह पर्याप्त स्तर झान ही है।

जब साधक दोनों शमथ और विपश्यना में कुछ हद तक कुशल हो जाए, तब उसे “इन कुशल मानसिक गुणों को आश्रवों के क्षय के लिए और विकसित करने की मेहनत करनी चाहिए।” (“आश्रव” का मतलब मन से अकुशलता की “बहती धाराएं” जिनके कारण पुनर्जन्म होता है। तीन प्रकार के आश्रव होते हैं – कामुक राग का आश्रव, भव का आश्रव, यानी कि किसी दुनिया के अनुभव में कोई व्यक्तित्व ग्रहण करने की इच्छा, और अविद्या का आश्रव, यानी कि चार आर्य सत्यों के बजाय किसी अन्य धारणा से अस्तित्व को देखना)। यहां उस स्थिति की व्याख्या हो रही है जहां शमथ और विपश्यना इकट्ठे बढ़ रहे हैं। मज्झिम निकाय १४९ में बताया गया है कैसे। छः इंद्रियों (मन को छठी इन्द्रिय मानकर), उनके विषयों, प्रत्येक इंद्रिय की चेतना, प्रत्येक इन्द्रिय पर विषय का स्पर्श, और जो भी इस स्पर्श के कारण उत्पन्न हो, सुखद, दुखद, या अदुखसुखद (न दुखद न सुखद) अनुभव, ये सारी बातें जैसे वास्तव में हैं, वैसे ही उनको देखना और जानना। इन सारी घटनाओं से निर्लिप्त रहकर ध्यान बनाए रखना – अनासक्त, आत्मविश्वासी, उनकी कमियों पर ध्यान रखते हुए, उनके प्रति तृष्णा को त्यागना – इसे विपश्यना माना जाएगा। साथ ही, शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं और मुसीबतों को छोड़कर, सुख-शांति का अनुभव करना – इसे शमथ माना जाएगा। इस प्रकार, यह साधना दोनों विपश्यना और शमथ को इकट्ठे विकसित करने के साथ सारे ३७ “बोधि-पंख धर्मों/लक्षणों” को पूरा करती है, जिनमें झान की प्राप्ति भी शामिल है।

तो सही मार्ग वैसा है जिसमें विपश्यना और शमथ को संतुलन में लाया जाए, जहां ये दोनों गुण एक दूसरे के सहायक और निदर्शक बन जाएं। विपश्यना के कारण, शमथ की स्थिरता और शांति भ्रमित, आलसी, तंद्रिल, धुंधली नहीं हो जाती। शमथ के कारण, साधना में द्वेष का आविर्भाव नहीं आता, जो मन को जबरदस्ती से वर्तमान में दबाए रखने पर आ सकता है, जैसे कि उल्टी या चक्कर आना, घबराहट, भय, या पूरी बेहोशी भी।

इस व्याख्या से ज़ाहिर है कि शमथ और विपश्यना दो अलग-अलग ध्यान विधियां नहीं, बल्कि वर्तमान क्षण पर ध्यान देने के दो पहलू हैं, जो एक दूसरे की पूर्ति करते हैं। शमथ से वर्तमान क्षण में एक सुखद निवास मिलता है। विपश्यना से वर्तमान की घटनाओं का स्पष्ट दर्शन होता है, जैसे वे, अपने संदर्भ में ही, सचमुच हो रही हैं। यह भी ज़ाहिर है कि झान में कुशलता प्राप्त करने हेतु दोनों गुणों को इकट्ठे काम क्यों करना होगा। जैसे कि आनापानसति (मज्झिम निकाय ११८) के निर्देश बताते हैं, इस कौशल में हैं शामिल तीन बातें – मन को मुदित करना, समाहित करना, और विमोचित करना। मुदित करने का मतलब वर्तमान में सुख और आनंद महसूस करना। समाहित करने का मतलब मन को ध्यान के विषय पर स्थिर रखना। और विमोचित करने का मतलब मन को स्थूल समाधि की स्थिति से सूक्ष्म की ओर ले जाने में जो प्रक्रियाएं छोड़नी होती हैं, उनसे छुटकारा पाना। ये पहली दो क्रियाएं शमथ के कार्य हैं, और तीसरी विपश्यना का। तीनों को साथ मिलकर काम करना होगा। अगर मन को केवल मुदित और समाहित किया जाए, बिना कुछ त्याग किए, तो मन अपनी समाधि का शोधन ही नहीं कर पाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि जो प्रक्रियाएं मन को समाधि के किसी एक स्तर तक पहुंचातीं हैं, उन्हें ही त्यागने पर मन उससे गहरे स्तर तक पहुंच सकता है (अंगुत्तर निकाय ९:३४)। मन को बिल्कुल उन्हीं प्रक्रियाओं से मुक्त करना, जो समाधि के निचले स्तर को कायम रखतीं हैं, मगर उच्च स्तर के लिए बाधा बन जाती हैं – ऐसा कुशलतापूर्वक करने का एक ही उपाय है, और वह है वर्तमान में मानसिक घटनाओं का स्पष्ट निरीक्षण करना। वहीं दूसरी ओर, अगर केवल उन प्रक्रियाओं को त्यागने का प्रयास किया, बिना पहचाने कि त्यागने पर मन की स्थिरता और शांति कैसे गहरी हो जाती है, तो मन समाधि से बाहर ही निकल जाएगा। इसीलिए सम्यक समाधि में कुशलता प्राप्त करने के लिए शमथ और विपश्यना को साथ-साथ काम करना होगा।

फिर प्रश्न उठता है – अगर झान में कुशलता प्राप्त करने के लिए शमथ के साथ-साथ विपश्यना का भी पात्र है, और झान केवल बौद्धों की साधना नहीं, तो फिर विपश्यना कैसे केवल बौद्धों की हुई? उत्तर यह है कि विपश्यना भी केवल बौद्धों की नहीं है। शमथ और विपश्यना में खास तौर पर बौद्ध योगदान ये हैं – १) जिस हद तक दोनों को विकसित किया गया, २) उनके विकसित करने का मार्ग, यानी कि, किन प्रकार के प्रश्नों द्वारा उन्हें बढ़ाया गया, और ३) मन की पूर्ण मुक्ति लाने के लिए कैसे उनका भिन्न-भिन्न साधना प्रयोगों के साथ उपयोग किया गया।

मज्झिम निकाय ७३ में बुद्ध एक भिक्षु को निर्देश देते हैं जो झान में सम्पन्न हो चुका है। वे उसे शमथ और विपश्यना को और विकसित करने की सलाह देते हैं ताकि वह छः चैतसिक कौशलों में संपन्नता प्राप्त कर पाए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है “मानसिक आश्रवों की समाप्ति से वह आश्रव-रहित चित्त-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति में निवास करता है, स्वयं उन्हें अस्तित्व में लाकर और जानकर, अभी और यहीं।” यह बौद्ध धर्म के अंतिम लक्ष्य की व्याख्या है। कुछ लेखकों के मुताबिक यह केवल विपश्यना का फल है, मगर कुछ सूत्र ऐसे हैं जिनसे बात अलग मालूम पड़ती है।

पहले देखो कि मुक्ति के दो अंग हैं – चित्त-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति। चित्त-विमुक्ति तब होती है जब साधक राग के प्रति पूरी तरह से वैरागी जागता है। यह शमथ का अंतिम फल है। प्रज्ञा-विमुक्ति तब होती है जब अविद्या के प्रति वैराग्य जागता है। यह विपश्यना का अंतिम फल है (अंगुत्तर निकाय २:२९-३०)। इस प्रकार, दोनों शमथ और विपश्यना यह दो-अंग वाली विमुक्ति में भाग लेते हैं।

“सब्बासव सुत्त” (मज्झिम निकाय २) में कहा है कि मुक्ति “आश्रव-रहित” तभी होती है जब साधक “उचित तरह से ध्यान देता है” (योनिसो मनसिकार)। सूत्र में जैसे समझाया गया है, उचित तरह से ध्यान देने का मतलब घटनाओं के बारे में उचित प्रश्न उठाना – स्वयं/अन्य या अस्तित्व/अस्तित्वहीनता के संदर्भ में नहीं, बल्कि चार आर्य सत्यों के संदर्भ में। यानी कि, “क्या मैं हूं? क्या नहीं हूं? मैं क्या हूं?” पूछे बगैर, किसी अनुभव के बारे में पूछना, “क्या यह दुख है? दुख का कारण है? दुख की समाप्ति है? दुख समाप्ति का मार्ग है?” क्योंकि चारों वर्गों के साथ संबंधित कर्तव्य है, ये प्रश्न उत्तर के रूप में कार्रवाई मांगते हैं – दुख को समझना चाहिए, उसके कारण को छोड़ना चाहिए, उसकी समाप्ति का साक्षात्कार करना चाहिए, और उसकी समाप्ति के मार्ग को विकसित करना चाहिए।

शमथ और विपश्यना मार्ग के वर्ग में शामिल हैं, तो उन्हें विकसित करना चाहिए। यह करने के लिए, हमें दुख को समझने के कार्य पर उचित ध्यान देना पड़ेगा – दुख को “पांच आसक्ति के स्कंधों” के स्तर पर समझना होगा। यह स्कंध हैं रूप (शरीर), संवेदना, संज्ञा (किसी घटना को नाम देने या पहचानने की क्रिया), संस्कार (मानस और शरीर की घटनाओं को जोड़ने की क्रिया, जैसे कि विचारों की उत्पत्ति), और चैतन्य (इंद्रियों पर होने वाली घटनाओं को जानने की क्रिया – पाली में “विञ्ञाण”)। इन स्कंधों पर उचित ध्यान देने का मतलब इनकी कमियों पर ध्यान देना – देखना कि ये हैं “अनित्य, दुखदायक, एक रोग, एक फोड़ा, एक तीर, बुरे, एक पीड़ा, पराए, एक विघटन, शून्य, अनात्मीय” (संयुक्त निकाय २२:१२२)। इस कार्य को पूरा करने में बुद्ध की एक खास प्रश्न सूची है – “यह स्कंध नित्य है के अनित्य?” “और जो अनित्य है वह सुखदायक होता है के दुखदायक?” “और जो अनित्य है, दुखदायक है, परिवर्तनशील है, क्या उसके बारे में ऐसा मानना उचित है कि “यह मेरा है, यह मैं हूं, यह मेरी आत्मा है।”?” (संयुक्त निकाय २२:५९)। पांचों स्कंधों के हर उदाहरण पर ये प्रश्न पूछे जाते हैं, चाहे जैसे भी प्रकट हों, “अतीत, वर्तमान या भविष्य के, आंतरिक या बाहरी, स्थूल या सूक्ष्म, साधारण या उत्कृष्ट, पास या दूर।” यानी कि, साधक अपने छौं इंद्रियों के लोक में हर अनुभव के बारे में ये प्रश्न पूछता है।

यह प्रश्न सूची एक खास प्रकार के ज्ञान तक पहुंचाने वाली रणनीति में शामिल है। उस ज्ञान को कहते हैं “जैसे (घटना) हो गई है, वैसे उसे देखना और जानना” (“यथा भूत ञाण दस्सन”)। इसमें, घटनाओं को पांच स्तरों के माध्यम से जाना जाता है – उनका उदय, उनका व्यय, उनका आकर्षण, उनकी कमियां, और उनसे छुटकारा – जो यहां मिलता है वैराग्य से।

कुछ लेखकों के मुताबिक, ये पांच स्तरों वाली दृष्टि केवल पहले दो स्तरों पर ध्यान देने से हासिल हो सकती है। वर्तमान में स्कंधों के उदय और व्यय पर ध्यान को निरंतरता से रखने पर, उनका मानना है, स्वाभाविक रूप से आकर्षण, कमियां और छुटकारे का ज्ञान हो जाएगा, पूर्ण विमुक्ति के लिए पर्याप्त। मगर सूत्र इस बात की पुष्टि नहीं करते, और व्यावहारिक अनुभव से भी यह बात सही नहीं लगती। जैसे कि मज्झिम निकाय १०१ में कहा गया है, हर साधक पाएगा कि, स्थिति के हिसाब से, कभी केवल समता से देखकर वह दुख के किसी कारण के प्रति वैराग्य जगा लेगा, मगर कभी उसे वैराग्य जगाने के लिए जानबूझकर प्रयत्न करना पड़ेगा, जिससे छुटकारा मिल पाए। किस स्थिति में कौन-सी तरकीब काम करेगी, इसके बारे में सूत्र अस्पष्ट है, शायद जानबूझकर। यह ऐसी बात है जो प्रत्येक साधक को स्वयं अपने अनुभव से जाननी पड़ेगी।

सब्बासव सुत्त इस बात को और विस्तार से समझाता है। उसमें वैराग्य जगाने के लिए सात प्रकार के प्रयोगों की व्याख्या की गई है। विपश्यना, मानसिक गुण के तौर पर, सातों से संबंधित है, मगर सबसे स्पष्ट रूप से पहले प्रयोग के साथ – “देखना” – यानी, हर घटना को चार आर्य सत्यों और उनसे संबंधित कर्तव्यों के संदर्भ में देखना। बाकी के छः प्रयोग इन कर्तव्यों को पूरा करने में सहायक बनते हैं। वे हैं – अकुशल मनोस्थिति पैदा करने वाले इंद्रियों के वस्तुओं से मन का संयम करना; भोजन, कपड़ा, घर और दवा – इन चार आवश्यकताओं के उपयोग के उचित कारणों पर चिंतन करना; दुखद संवेदनाओं को सहना; प्रत्यक्ष खतरों और अनुचित साथियों से दूर रहना; कामुक इच्छा, दुर्भावना, हिंसकता, और अन्य अकुशल गुणों को नष्ट करना; और सात बोधि के अंगों को विकसित करना – यानी कि, स्मरण-शीलता, मानसिक गुणों का विश्लेषण, परिश्रम, प्रीति, शांति, समाधि, और समता।

प्रत्येक प्रयोग में कई तरीके शामिल हैं। जैसे “नष्ट करने” वक्त हम कोई अकुशल मनोस्थिति को पांच तरीकों से हटा सकते हैं – उसकी जगह एक कुशल मनोस्थिति स्थापित करके, उसकी कमियों के बारे में सोच के, उस पर से ध्यान हटा के, उसे जगाने वाले विचार-संस्कारों को शांत करके, या बस अपनी इच्छा शक्ति से उसका दमन करके (मज्झिम निकाय २०)। अन्य सूत्रों में से कई ऐसे उदाहरण ढूंढे जा सकते हैं। मूल बात यह है कि मन के तौर-तरीकों जटिल और विभिन्न हैं। अलग-अलग किस्म के आश्रव अलग-अलग रूप धारण करके उमड़-उमड़ के आ सकते हैं, जिनसे अलग-अलग प्रयोगों द्वारा निपटना होगा। एक साधक का कौशल यही है कि वह भिन्न-भिन्न तरीकों में निपुणता प्राप्त कर ले, और अपनी संवेदनशीलता विकसित कर ले, ताकि जान सके कब कौन-सा तरीका काम करेगा।

मगर इस सब से पहले हमें इन कौशलों को सीखने की ही प्रेरणा जगानी होगी और तीव्र रखनी होगी। आम तौर पर चिंतन के जो मूलभूत वर्ग हैं, जो सोचने के लिए इतने बुनियादी होते हैं – जैसे कि “अस्तित्व होना/न होना” या “मैं/अन्य” – उचित तरह से ध्यान देने के लिए इन्हें ही छोड़ना पड़ता है। इसीलिए, साधक को उचित विषय पर ध्यान देना अपनाने के लिए बड़े तगड़े कारण चाहिए होते हैं। सब्बासव सुत्त में कहा गया है कि जो भी उचित विषय पर ध्यान देना सीखना चाहे, उसे सबसे पहले आर्य लोगों को श्रेष्ठ मानना होगा, यानी कि भगवान बुद्ध और उनके जागृत शिष्यों को। मतलब यह कि, जो इस मार्ग पर चले हैं, उन्हें सचमुच सर्वोत्तम मानना। उनके शिक्षण और अनुशासन में शिक्षित भी होना होगा। मज्झिम निकाय ११८ के हिसाब से, इसका मतलब यह कि उनकी कर्म और पुनर्जन्म पर शिक्षा का विश्वास करना होगा, जिससे चार आर्य सत्यों को अनुभव के मूलभूत वर्गों के रूप में अपनाने की दार्शनिक और भावनात्मक प्रेरणा मिलती है। उनके अनुशासन में शिक्षित होने में शामिल हैं, शील का पालन करना, और आश्रव समाप्ति के उल्लिखित सात प्रयोगों में कुछ कौशल बनाए रखना।

इस प्रकार की तैयारी के बिना साधक वर्तमान में उदय-व्यय देखने की साधना में गलत तरह के दृष्टिकोण, मनोभाव, और अपेक्षाएं लेकर आ सकता है, जिस कारण वह गलत प्रश्न पूछने लगेगा। जैसे कि अगर कोई अपनी “सच्ची आत्मा” की खोज में हो, तो वह, जानबूझकर या नहीं, समाधि में किसी विशाल, खुली हुई मनोस्थिति से आसक्ति पैदा कर सकता है, जो हर बदलाव स्वीकार करती लगती हो, और जिसमें ऐसा लगे कि सब समा जाता है। या अगर साधक पूरे ब्रह्मांड से संयुक्त होने का आभास चाहता हो, यह मानते हुए कि कुछ भी नित्य या ध्रुव ढूंढना जीवन-नकारात्मक बावलापन है, क्योंकि आखिरकार सब तो बदलता ही जाता है।

ऐसी कामनाएं रखने वाले व्यक्ति को केवल वर्तमान में घटनाओं के उत्पाद-व्यय के अनुभव से पांच स्तरों वाला “यथा भूत” ज्ञान नहीं मिलेगा। वह अपने खयालों को “दृष्टियों के आश्रव (प्रवाह)” या समाधि की शांत मानसिक स्थिति को “भव (होने) के आश्रव (प्रवाह)” के रूप में देखने से कतराएगा। नतीजतन, वह इन अनुभवों पर चार आर्य सत्यों को लागू करना नहीं चाहेगा। सिर्फ़ एक ऐसा व्यक्ति जो इन आश्रवों को आश्रव के रूप में देखने के लिए तैयार हो, और ऐसी दृष्टि रखने की ज़रूरत समझता हो, वही उचित ध्यान देने के लिए, और आश्रवों से छुटकारा पाने के लिए योग्य होगा।

तो, अपने प्रारंभिक प्रश्न पर लौटते हुए – विपश्यना कोई साधना विधि का नाम नहीं है, बल्कि एक मानसिक गुण का, जिसका अर्थ है वर्तमान में हो रही घटनाओं को स्पष्ट रूप से देखने का कौशल। स्मृति और सजगता विपश्यना के लिए बेशक सहायक हैं, मगर केवल उनके सहारे पूर्ण विमुक्ति लाने वाली विपश्यना का विकास नहीं हो सकता। अन्य प्रयोगों और तरीकों की ज़रूरत होती है। विशेष रूप से, विपश्यना के साथ शमथ की ज़रूरत है, जिसका अर्थ है वर्तमान में शांत और सुखद रूप से मन को स्थिर करने का कौशल, ताकि साधक झान, यानी तीव्र समाधि की अवस्था में निपुण हो जाए। फिर वह इस निपुणता के आधार पर शमथ और विपश्यना का उपयोग करता है और अपने पूरे अनुभव के बारे में कुशल रूप से पूछताछ करता है, जिसे कहते हैं उचित विषयों पर ध्यान देना। इसमें घटनाओं का विश्लेषण “मैं/अन्य” या “अस्तित्व है/अस्तित्व नहीं है” के संदर्भ में नहीं किया जाता, बल्कि चार आर्य सत्यों के संदर्भ में किया जाता है, जबतक कि हर घटना का पांच अंगों वाला ज्ञान न मिल जाए – उत्पाद, व्यय, आकर्षण, कमी, और छुटकारा। केवल तब मन मुक्ति चख पाएगा।

शमथ और विपश्यना के विकास को और बहुत से मानसिक भावों, गुणों, और साधना विधियों की ज़रूरत होती है। इसीलिए बुद्ध इन्हें एक महान कार्यक्रम का हिस्सा बनाकर सिखाते थे,‌ जिसमें शामिल है आर्य लोगों का आदर करना, मानसिक आश्रवों को त्यागने की सातों तरकीबें सीखना, और आर्य मार्ग के आठों अंगों को विकसित करना। पूरी साधना को किसी एक छोटे अंश के समान मानने से परिणाम भी छोटे मिलेंगे, क्योंकि साधना बढ़ईगिरी की तरह एक कौशल है, जिसमें निपुणता प्राप्त करने हेतु, अलग-अलग परिस्थितियों के मुताबिक ढ़ेर सारे उपकरणों के उपयोग में निपुणता प्राप्त करनी होगी। अपने आप को केवल एक साधना प्रयोग में सीमित रखने का मतलब जैसे अगर कोई घर बनाने की कोशिश कर रहा हो, मगर उसका इरादा कच्चा है, और उसकी औजार पेटी में केवल हथौड़े ही हैं।