एक निर्देशित ध्यान प्रयोग

आरामदायक रूप से रीढ़ सीधी रखकर बैठो। आंखें बंद कर लो और मन में मैत्री के विचार उत्पन्न करो। पहले, अपने लिए मैत्री महसूस करो, क्योंकि यदि हम अपने से ही मैत्री न कर सकें, यदि सच्चे मन से अपने सुख की कामना न कर सकें, तो दूसरों के सुख की सच्ची कामना नहीं कर पाएंगे। तो बस ऐसा सोचो – “मेरा भला हो। मैं सच्चा सुख पा पाऊं।” यह स्वार्थी कामना नहीं है क्योंकि सच्चा सुख भीतर से उत्पन्न होता है। वास्तव में, अगर तुम अपने भीतर सुख का स्रोत खोज निकालो और विकसित कर लो, तो उसका प्रवाह दूसरों को भी छू लेगा। यह एक ऐसा सुख है जो किसी से कुछ भी हासिल करने पर निर्भर नहीं है।

अब दूसरों के प्रति मैत्री भाव जगाओ, पहले उन लोगों के लिए जो दिल के करीब हैं - माता-पिता, परिवार के सदस्य, और घनिष्ठ मित्र। उन सबका भी मंगल हो। वे भी सच्चा सुख पा पाएं। अब इन विचारों को सबके प्रति फैलाते जाओ – वे लोग जिन्हें तुम अच्छे से जानते हो, फिर जिन्हें इतनी अच्छी तरह नहीं जानते, फिर जिन्हें पसंद करते हो, फिर जिन्हें ना पसंद करते हो न नापसंद करते हो, और फिर उनके प्रति भी जिन्हें नापसंद करते हो। अपनी मैत्री पर कोई सीमा न रखो, क्योंकि इससे मन पर सीमाएं लग जाती हैं। अब उनके प्रति भी मैत्री जगाओ जिन्हें तुम जानते भी नहीं। और केवल मनुष्य ही नहीं, हर दिशा में हर प्रकार के प्राणी के प्रति मैत्री महसूस करो – पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर, नीचे, अनंत दिशाओं में सबका मंगल हो, सब सच्चा सुख पा पाएं।

अब अपने खयालों को वापस वर्तमान में लाओ। अगर सच्चा सुख चाहते हो, तो वर्तमान में ही खोजना पड़ेगा, क्योंकि अतीत तो बीत चुका है और भविष्य पक्का नहीं है। तो यहां वर्तमान में मौजूद क्या है? यहां शरीर है, जो बैठा सांस ले रहा है, और मन है, जो सचेत है और सोच रहा है। तो इन सारी बातों को इकट्ठा करो। अपनी सांस के बारे में सोचो, आती सांस और जाती सांस के प्रति सचेत रहो। अपने विचारों को सांस पर लौटाते रहो – इसे कहते हैं स्मृति या स्मरण-शीलता। आते-जाते सांस के प्रति सचेत रहना – इसे कहते हैं सजगता। इन दो गुणों को मन में साथ-साथ रखो। स्मृति को बलवान करने के लिए चाहो तो एक शब्द का उपयोग कर सकते हो, जैसे कि “बुद्धो,” जिसका अर्थ है “जागृत।” आते सांस के साथ सोचो “बुद्” और जाते सांस के साथ सोचो “धो।”

सांस को आरामदायक करने की कोशिश करो। उसे आरामदायक होने की अनुमति दो। तत्काल अपने सुख की देखभाल करने का यह एक पक्का उपाय सीखो, जिससे सजगता भी बलवान होती है। अलग-अलग प्रयोग करके देखो कि शरीर को अभी किस प्रकार की सांस सबसे सुखद लगती है। हो सकता है लंबी सांसें, छोटी सांसें, आती लंबी और जाती छोटी, या आती छोटी और जाती लंबी। भारी या हल्की, तेज़ या धीमी, गहरी या उथली। जैसे ही एक सुखद लय मिल जाए, कुछ देर उसके साथ समय बिताओ। सांस लेने की संवेदना का रस लेना सीखो। आम तौर पर, सांसों में रुकावट न हो तो बेहतर होगा। सांस को खुलकर बहने दो। सांस को केवल फेफड़ों से गुजरती हवा न मानकर, उसे शरीर में ऊर्जा के प्रवाह के रूप में समझो, जो प्रत्येक आते-जाते सांस के साथ पूरे शरीर में बहता है – वह ऊर्जा का प्रवाह जिसके ज़रिए शरीर हवा भीतर लेता है और बाहर छोड़ता है। वह ऊर्जा का प्रवाह कैसा मालूम पड़ रहा है? उसके प्रति संवेदनशील होने की कोशिश करो। हो सकता है कि शरीर की ज़रूरतें कुछ देर बाद बदल जाएं। कभी सांस का कोई लय या ढंग सही लग सकता है, और कुछ देर बाद कुछ और सही लग सकता है। अपने शरीर की वर्तमान ज़रूरतों को पहचानकर उचित प्रतिक्रिया करना सीखो। अभी शरीर किस प्रकार की प्राण ऊर्जा मांग रहा है? उस मांग को तुम कैसे पूरा कर सकते हो? अगर थकान महसूस कर रहे हो, तो वैसी सांस लेने की कोशिश करो जिससे शरीर जाग उठे। अगर तनाव महसूस कर रहे हो, तो वैसी सांस लो जिससे आराम मिले।

अगर मन भटक जाए, प्यार से उसे वापस ले आओ। दस बार भटके, तो दस बार वापस लाओ। सौ बार भटके, तो सौ बार वापस लाओ। हार न मानो। इस गुण को “उत्सुकता” या “लगन” कहते हैं, पाली में “आतप्पा।” मतलब, जैसे ही पता चले कि मन भटक गया है, तुरंत वापस ले आओ। आवारा मत घूमो – कभी फूल सूंघते-सूंघते, तो कभी आसमान ताकते-ताकते, तो कभी पंछियों को सुनते-सुनते। अभी काम करने आए हो – आरामदायक सांस कैसे लेते हैं, मन को कैसे शांत कर के वर्तमान क्षण में स्थिर रख सकते हैं, यह सीखने का काम।

हर बार सांस पर वापस लौटने पर एक बेहद सुखदायक सांस लेने की कोशिश करो। इससे लौटने की इच्छा बढ़ेगी।

जब सांस आरामदायक लगने लगे, तब उसे शरीर के अन्य अंगों में महसूस करना शुरू कर सकते हो। अगर छोटे से स्थान में ही आरामदायक सांस के साथ रहोगे तो नींद आ सकती है। इसलिए जानबूझकर शरीर के अंग-अंग में अपनी चेतना फैलाओ। एक-एक करके शरीर का अंग-प्रत्यंग महसूस करो। प्रारंभ करने के लिए नाभि के आसपास ध्यान केंद्रित करो। शरीर के इस अंग को अपनी चेतना में खोजो – अभी कहां महसूस होता मालूम पड़ रहा है? फिर जांच के देखो – आते सांस के साथ कैसा महसूस करता है? जाते सांस के साथ कैसा महसूस करता है? किस प्रकार की सांस यहां अच्छी लग रही है? एक-दो सांसों के लिए बस ध्यान दो, और देखो अगर आते या जाते सांस के साथ कोई तनाव या खिंचाव तो नहीं पैदा हो रहा। तनावपूर्ण ढंग से तो नहीं सांस खींच रहे? दबोच कर तो नहीं छोड़ रहे? ज़बरदस्ती से बाहर तो नहीं धकेल रहे? अगर ऐसी कोई भी क्रिया करते हुए खुद को पाते हो, तो बस शिथिल होने दो। तनाव को पिघलते हुए महसूस करो, आते सांस पर भी, जाते सांस पर भी। चाहे तो प्राण ऊर्जा को बिल्कुल वहीं, नाभी से ही शरीर में प्रवेश करते हुए महसूस करो, कोई भी तनाव या खिंचाव को शिथिल करते हुए महसूस करो…

फिर चेतना को दाईं ओर, पेट के निचले दाहिने भाग पर ले आओ, और वही तीन चरणों का पालन करो – १. शरीर के उस अंग को अपनी चेतना में लगभग खोजो, २) वहां किस प्रकार की सांसें सुखद लगती हैं, यह देखने के लिए जांचो कि आते सांस के साथ वहां कैसा महसूस हो रहा है, जाते सांस के साथ कैसा, और ३) अगर कोई भी तनाव या खिंचाव महसूस होता हो, तो बस उसे शिथिल होने दो… अब चेतना को बाईं ओर, पेट के निचले बाएं भाग पर ले आओ, और वही तीन चरणों का पालन करो।

अब मन को छाती और नाभि के बीच सौर जाल पर ले आओ… और फिर उसकी दाईं ओर… और फिर बाएं ओर… फिर छाती पर… फिर गले के नीचे… और फिर सिर के बीच में। सिर में प्राण ऊर्जा के साथ सावधानी बरतो। बड़ी कोमलता से उसे प्रवेश करते हुए महसूस करो, केवल नाक से ही नहीं, बल्कि आंखों से भी, कानों से भी, सिर के सिरे से भी, गर्दन के पीछे से भी, मस्तिष्क की गहराइयों तक, बड़ी कोमलता से, चहरे, जबड़े, और गर्दन के आस-पास, या और कहीं भी जहां कोई तनाव महसूस हो, तो उसे शिथिल करते हुए सांस लो, शिथिल करते हुए सांस छोड़ो…

फिर वहां से धीरे-धीरे ध्यान को पीठ से नीचे की तरफ गुज़ारो, टांगों से होते, पांवों से पांवों की उंगलियों और उंगलियों के बीच की जगहों तक। पहले की तरह, प्रत्येक अंग पर ध्यान दो, जांचो कि आते-जाते सांस के साथ कैसा महसूस कर रहा है, और कोई भी तनाव या खिंचाव को शिथिल होने दो ताकि प्राण ऊर्जा आसानी से खुल कर बह पाए। फिर पूरी प्रक्रिया को दोहराओ, गर्दन के पीछे से शुरू करके कंधों से गुज़रते हुए, बाजुओं से, हाथों से, उंगलियों तक।

ऐसे शरीर का सर्वेक्षण बार-बार कर सकते हो जब तक कि ऐसा न लगे कि मन ठहरने के लिए तैयार हो गया है।

फिर, शरीर के जिस स्थान पर मन सबसे सहज रूप से स्थिर और केंद्रित महसूस करे, उसी स्थान पर ध्यान केंद्रित करो। बस, उधर अपनी चेतना को सांस के साथ एकाग्र होकर आराम से ठहरने दो। साथ ही, चेतना की सीमाओं को फैलने दो, ताकि वह पूरे शरीर में भर जाए, जैसे कमरे के बीच में रखी मोमबत्ती – ज्योति तो एक स्थान पर होती है मगर प्रकाश पूरे कमरे को रौशन कर देता है। या जाल पर एक मकड़ी – मकड़ी एक स्थान पर बैठी रहती है मगर पूरे जाल की खबर रखती है। ऐसी फैली हुई चेतना को कायम रखने के लिए उत्सुक रहो। हो सकता है कि चेतना बार-बार छोटी होती मालूम पड़े, जैसे एक गुब्बारा जिसमें छोटा-सा छेद हो। खासकर जाती सांस के दौरान ऐसा होने की संभावना रहती है। तो ऐसा सोचते रहो – “पूरा शरीर, पूरा शरीर, पूरे शरीर में सांस, सिर के सिरे से लेकर पांव की उंगलियों तक,” ताकि हर सांस के साथ पूरा शरीर महसूस होता रहे। सोचिए कि प्राण ऊर्जा शरीर के रोम-रोम से आ रही है, रोम-रोम से जा रही है। इस केंद्रित मगर विशाल चेतना को कायम रखने का दृढ़ निश्चय करो। और कुछ भी सोचने, और कहीं भी जाने,‌ या और कुछ भी करने कि ज़रूरत नहीं। बस वर्तमान क्षण की यह केंद्रित और फैली हुई चेतना के साथ जुड़े रहो…

जब साधना समाप्त करने का समय आ जाए, खुद को याद दिलाओ कि समाप्त करने का भी कौशल होता है। बस छलांग लगाकर उठ न जाना। मेरे गुरुजी, आचार्य फ़ुअंग कहते थे कि अधिकतर लोगों के लिए साधना करना, दूसरी मंजिल तक सीढ़ी चढ़ने समान होता है, धीरे-धीरे, एक-एक कदम लेकर, बड़े ध्यान से ऊपर चढ़ना। मगर ऊपर पहुंचते ही वे सीधे खिड़की से बाहर छलांग लगा देते हैं। खुद को ऐसा न बनने दना। सोचो कि खुद को केंद्रित करने में कितना परिश्रम लगा। उसे व्यर्थ न गंवाओ।

साधना समाप्ति का पहला चरण है फिर से सभी लोगों और प्राणियों के लिए मैत्री भाव जगाना। फिर, आंखें खोलने से पहले, खुद को याद दिलाओ कि बेशक अब आंखें खुली रखोगे, अपना ध्यान फिर भी शरीर में सांस पर ही केंद्रित रखोगे। जितनी देर उस केंद्र को कायम रख सकते हो, रखने की कोशिश करो, उठने वक्त, चलने वक्त, बातचीत करने वक्त, हर स्थिति में। यानी कि, साधना समाप्त करने का कौशल है, साधना समाप्त होने ही न देना, चाहे और जो कुछ भी कर रहे हो। वैसे केंद्रित होने के भाव से ही अपने बाकी के कार्य करना। अगर तुम मन को ऐसे केंद्रित रख पाओगे, तो उसके चाल-चलन को देखने के लिए एक पैमाना मिल जाएगा, कि मन आंतरिक और बाहरी घटनाओं पर कैसी प्रतिक्रिया कर रहा है। ऐसा एक स्थिर केंद्र होने पर ही मन के चाल-चलन में कोई बोध मिलने की संभावना हो सकती है।