सम्यक वचन
मेरे आचार्य ने जैसे एक दफ़ा कहा – “अगर मुँह पर लगाम नहीं दे सकते, तो मन पर कैसे दे पाओगे?” इसी बात से दैनिक साधना में सम्यक वचन का महत्व पता चलता है।
सम्यक वचन की परिभाषा को इस भांति की गई है – निम्नलिखित चार प्रकार के हानिकारक वचनों से बचना।
१. झूठ (सत्य को बहकाने के लिए कहे गए मिथ्या वचन)।
२. चुगली (लोगों के बीच वैर पैदा करने के लिए कहे गए वचन)।
३. कठोर वचन (किसी को दुख देने के लिए कहे गए वचन)।
४. व्यर्थ गपशप (कोई भी उद्देश्य के बगैर कहे गए वचन)।
ध्यान दो कि महत्व हमेशा उद्देश्य को दिया गया है। इससे सम्यक वचन का मन की साधना से संबंध पता चलता है। बोलने से पहले तुम्हें सोचना चाहिए कि तुम बोलना क्यों चाहते हैं। ऐसा करने से मन के भीतर की सभा के गुप्त, छलपूर्ण वाद-विवाद स्पष्ट होने लगता है। अगर किसी फ़ैसले के पीछे अकुशल इरादे दिखाई पड़ते हैं, तो उसे इनकार किया जा सकता है। इससे तुम अपने प्रति और भी सचेत, सच्चे और दृढ़ होना सीखते हो। और तो और, बाद में पश्चाताप लाने वाले वचन कहने से भी बच जाते हो। इस प्रकार, तुम साधना के लिए उपयोगी मानसिक गुणों को प्रबल करते हो और साथ ही ध्यान के समय, दुखद यादों से बचते हो, जो बाधा बनकर ध्यान भंग कर सकती हैं।
सम्यक वचन का अर्थ है सत्य, मधुर वचन जो मैत्री पैदा करें और मन में समाने के लायक हों। सम्यक वचन का अभ्यास करने से वचन उपहार बन जाते हैं। अन्य लोग तुम्हें और करीबी से सुनने लगेंगे और वैसे ही सम्यक प्रकार से उत्तर देने लगेंगे। इससे तुम्हें अपने कर्मों की शक्ति का एहसास होगा – वर्तमान में कर्म करने का ढंग बदलने से तुम्हारे संसार का अनुभव सचमुच प्रभावित होता है। अतीत का गुलाम रहना अनिवार्य नहीं है।
हम में से बहुतों के लिए सम्यक वचन की साधना सबसे कठिन हमारी हंसी-मज़ाक की शैली में होगी। हमें आदत है, हंसने-हंसाने के लिए, बढ़ा-चढ़ाकर बातों करना, उल्टे मतलब की बातें करना, किसी की जाति का मज़ाक उड़ाना, या बचपना करना – सब मिथ्या वचन के उदाहरण।
अगर लोगों को ऐसे लापरवाह हास्य की आदत पड़ जाए, वे हमारी कही बातों को गौर से सुनना बंद कर देंगे। इस प्रकार, हम अपना ही वचन सस्ता कर देते हैं। वैसे भी विश्व में इतने द्वंद्व हैं कि बढ़ा-चढ़ाने या उल्टी बात कहने की ज़रूरत ही नहीं। महान हास्य-कलाकार वही होते हैं जो हमें सीधे रूप से परिस्थिति की सच्चाई दिखाते हैं।
हास्य को सच्चे, समझदार और सार्थक रूप में अभिव्यक्त करने के लिए थोड़ा विचार और परिश्रम करना ज़रूरी तो है, मगर ऐसे हास्य में निपुणता प्राप्त करके हम पाएंगे कि वह इस श्रम के लायक ही है। हम अपनी बुद्धि भी तेज़ कर देंगे और अपना वाचिक वातावरण भी सुधार देंगे। इस प्रकार, हमारा हंसी-मज़ाक भी साधना में शामिल हो जाता है, सद्गुणों को विकसित करने का और आस-पास के लोगों को कुछ मूल्यवान देने का अवसर बन जाता है।
इसलिए, अपने कथन और उसके कारण पर ध्यान दो। पाओगे कि जीभ हिलाने से हमेशा भूल नहीं होती।




