शील की औषधि शक्ति

भगवान बुद्ध, एक चिकित्सक की तरह, मानव जाति की आध्यात्मिक बीमारियों का इलाज करते थे। तड़पते हुए, दुखी मन वालों के लिए उनकी शिक्षा औषधि समान थी।

प्राचीन काल से बुद्ध की शिक्षा को औषधि के रूप में देखा गया है, और यह दृष्टि अब आधुनिक काल में भी प्रचलित हो गई है। अक्सर ध्यान की क्रिया मन के रोगों के इलाज की तरह दर्शाई जाती है, और आजकल कई मनोवैज्ञानिक उसकी साधना करने की सलाह देते हैं।

हालांकि, अनुभव से पता चलता है कि केवल ध्यान से पूरा इलाज नहीं होता। उसके साथ किसी अन्य साधन की आवश्यकता मालूम पड़ती है। विशेष रूप से, आजकल के साधक आधुनिक समाज की समस्याओं से इतने घायल हो चुके हैं कि उनमें वह धैर्य, दृढ़ता और आत्मविश्वास का अभाव है जिससे वे ध्यान के औषधि प्रभाव का लाभ उठा पाएं।

इस कमी को पहचानते हुए, कई आचार्यों ने मान लिया है कि आधुनिक समस्याओं के लिए बौद्ध मार्ग अधूरा है। इसे पूरा करने के लिए, ध्यान को कइ अन्य साधनों के साथ मिलाया जाता है – जैसे कि मिथक-कथा, कविता, मनोविज्ञान, समाजिक आंदोलन, या फिर नृत्य और संगीत। परंतु, ऐसा तो नहीं कि कमी बौद्ध मार्ग की जगह हमारे पालन करने के ढंग में हो?

बौद्ध मार्ग में केवल ध्यान की साधना ही नहीं, बल्कि सदाचार भी मौजूद है, जिसका मूल है पांच शीलों का पालन। वास्तव में, पंचशीलों का पालन मार्ग का प्रारंभिक चरण है। आधुनिक सोच में पंचशीलों को पुराने ज़माने के सूखे-फीके नियम समान माना जाता है, ऐसे नियम जो आज की सामाजिक स्थिति से कोई संबंध नहीं रखते। मगर ऐसे सोचने से हम उनके उद्देश्य से वंचित रह जाएंगे, जो है – घायल मनों के लिए औषधि। विशेष रूप से, पंचशील आत्म-संकोच की दो मूल बिमारियों का इलाज करते हैं – पश्चाताप और अनदेखी।

जब हमारा व्यवहार किसी निश्चित पैमाने से गिर जाता है, हम या तो पश्चाताप करते हैं, या दो में से किसी एक प्रकार की अनदेखी का प्रयोग करते हैं। या तो अपने व्यवहार को अनदेखा करते हैं, या पैमाने को इनकार करते हैं। ऐसी प्रतिक्रियाएं मन पर घाव जैसी होती हैं। पश्चाताप खुले घाव की तरह नरम होता है, और अनदेखी करना नरम घाव पर जमी पपड़ी की तरह सख्त। जब मन इस प्रकार घायल होता है, तो वर्तमान में सुखद रूप से स्थापित नहीं हो सकता, क्योंकि खुद को नाज़ुक मांस या सख्त गांठों पर बैठा पाता है। यदि ज़बरदस्ती से मन को वर्तमान में रखा जाए, तो वह यहां केवल विकृत, तनावग्रस्त और अधूरे रूप से ही रह पाएगा। इस स्थिति में भले कोई ज्ञान भी प्राप्त हो, वह भी विकृत और अधूरा साबित होगा। केवल जब मन घावों और गांठों से मुक्त हो, तभी वह वर्तमान में सुखद रूप से स्थापित हो पाता है और अविकृत प्रज्ञा प्राप्त कर पाता है।

इधर पंचशीलों की भूमिका स्पष्ट होती है। वे इन्हीं घावों और गांठों का इलाज करने के लिए बनाए गए हैं। मंगलकारी आत्मसम्मान का आधार होता है किसी ऐसे पैमाने के अनुसार जीवन जीना, जो व्यावहारिक हो, स्पष्ट हो, करुणामय हो, और आदरणीय हो। पांच शील ऐसे ही पैमाने का पात्र निभाते हैं।

व्यावहारिक। पंचशीलों की परिभाषा सरल है – जानबूझकर हत्या, चोरी, व्यभिचार और नशा नहीं करना, और झूठ नहीं बोलना। अपने व्यवहार को इस प्रकार शीलवान बनाना हमेशा संभव है – हमेशा शायद सुलभ नहीं, मगर हमेशा संभव तो है ही। कुछ लोग शीलों को कुछ ज़्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर परिभाषित करते हैं – जैसे “चोरी नहीं करने” का अर्थ लेना “पृथ्वी की कोई साधन-सामग्री का दुरुपयोग नहीं करना।” मगर वे भी स्वीकार करते हैं कि वास्तव में ऐसे पैमाने के अनुसार जीना असंभव है। मनोविकृत व्यक्तियों के साथ समय बिताकर यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवन का असंभव पैमाना रखना कितना हानिकारक हो सकता है। अगर लोगों को ऐसा पैमाना दिया जाए, जो थोड़ा श्रम और थोड़ी स्मरण-शक्ति मांगता हो, तब उनका आत्मविश्वास खूब बढ़ता है जब वे उसे निभा पाते हैं। फिर वे निष्ठापूर्वक और भी कठिन कार्यों का सामना कर सकते हैं।

स्पष्ट। शीलों की परिभाषा में कोई संदेह की जगह नहीं है। इसका मतलब वे बिल्कुल स्पष्ट निर्देश देते हैं, जिसमें अगर-मगर करने की कोई जगह नहीं। कोई भी कार्य या तो शील-अनुकूल है या शील-प्रतिकूल। फिर से, ऐसे स्पष्ट पैमानों के अनुसार जीना बहुत ही शुभ होता है। बच्चों के पालन में यह साफ़-साफ़ दिखाई देता है। हालांकि बच्चे पक्के नियमों को लेकर नाराज़ हो सकते हैं, वे पक्के नियमों से कहीं ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं, बजाय कि कच्चे नियमों से, जिन्हें कभी भी तोड़ा-मरोड़ा जा सके। स्पष्ट नियम मन में अव्यक्त इरादों को चोरी-छिपे घुसने से रोकते हैं। जैसे, मानो कि तुम प्राणियों की हत्या केवल तभी न करता हो जब उनकी उपस्थिति से तुम्हें असुविधा न हो। तब, इस पैमाने में तुमने करुणा से ऊपर सुविधा को मान लिया है। सुविधा एक अव्यक्त इरादा बन गई, और जैसा कि हम जानते हैं, अव्यक्त इरादे धोखेबाजी के लिए एक बड़ी उपजाऊ जमीन होते हैं। मगर यदि तुम शीलों के दिए गए पैमानों को निभाओगे, तो जैसे कि बुद्ध कहते हैं, तुम सभी प्राणियों को असीमित सुरक्षा प्रदान कर रहे होगे। ऐसी कोई भी स्थिति नहीं जहां तुम किसी प्राणी को जानबूझकर जान से मार डालोगे, वे कितने भी असुविधाजनक क्यों न हों। बाकी के शीलों के तौर पर, तुम अन्य लोगों की संपत्ति और यौनिकता को भी असीमित सुरक्षा दोगे, और उनके साथ बातचीत में असीमित सत्य और सजगता प्रदान कर रहे होगे। जब तुम पाते हो कि ऐसे मामलों में अपने आप पर भरोसा कर सकते हो, तो तुम एक अखंडनीय आत्मविश्वास का अनुभव करोगे।

करुणामय। शील का पालन करना एक करुणामय क्रिया है – दोनों के प्रति, साधक के, और उसके कर्मों से प्रभावित लोगों के प्रति। शील का पालन करने का मतलब कर्म के सिद्धांत को अपनाना, जो सिखाता है कि तुम्हारी ज़िंदगी की सबसे प्रभावशाली शक्ति है तुम्हारे विचार, वचन और व्यवहार, जिन्हें तुम वर्तमान क्षण में चुन रहे हो। इसका मतलब तुम महत्वहीन नहीं हो। अपने हर चुनाव – घर, काम, या खेल में – हर चुनाव से तुम दुनिया के सतत सृजन में भाग ले रहे हो, अपनी शक्ति अभिव्यक्त कर रहे हो। साथ ही, यह सिद्धांत तुम्हें एक ऐसे पैमाने से खुद को मापना सिखाता है जो पूरी तरह से तुम्हारे नियंत्रण में है – तुम्हारे वर्तमान क्षण के इरादे और कर्म। यानी कि, यह सिद्धांत अपने आप को अपनी बुद्धि, बल, सौंदर्य, सम्पत्ति आदि से मापने पर मजबूर नहीं करता, क्योंकि ये सब वर्तमान कर्मों से ज़्यादा पुराने कर्मों पर निर्धारित हैं। साथ ही, यह सिद्धांत पश्चाताप में डूबकर रोने की सलाह नहीं देता। इसके बजाय, यह तुम्हें अपने आदर्श मूल्यों को निभाने के मौके पर ध्यान केंद्रित करवाता है, जो हर पल तुम्हें उपलब्ध हैं। शीलवान लोगों के साथ लेन-देन करना कभी भय या शक का कारण नहीं बनता। वे तुम्हारी और अपनी सुख की कामना में भेद नहीं देखते। उनका व्यक्तिगत मूल्य किसी के जीतने और किसी के हारने पर निर्भर नहीं होता। जब वे साधना में मैत्री और सजगता बढ़ाने की बात करते हैं, तो ये गुण उनके कार्यों में नज़र आते हैं। इस भांति, शील से केवल स्वस्थ लोग नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज भी विकसित होता है, जहां आत्मसम्मान और परस्पर सम्मान में विरोध नहीं।

आदरणीय। जब तुम जीवन जीने के कोई पैमाने को अपनाते हो, तब यह जानना जरूरी है कि वह किसका पैमाना है और कहां से आया है, क्योंकि वास्तव में, तुम उन्हीं लोगों के कुल में शामिल हो रहे हो, उनकी स्वीकृति चाह रहे हो, और उनके सही-गलत के मापदंड को अपना रहे हो। यहां, तुम एक बेहतर कुल की कामना नहीं कर पाओगे – भगवान बुद्ध और उनके जागृत शिष्य। पंचशीलों को पाली में कहा गया है “विञ्ञुपसत्थानि” अर्थात “ज्ञानियों से प्रशंसित।” जैसे हमें ग्रंथों से मालूम पड़ता है, ज्ञानी लोग केवल लोकप्रियता के अनुसार किसी पैमाने को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने सच्चे सुख की खोज में जिंदगी दावे पर लगाकर स्वयं जाना है कि, जैसे, हर परिस्थिति में झूठ हानिकारक होता है, और एक पक्के, बंधे हुए रिश्ते के बाहर यौन संबंध हर हालत में खतरनाक होता है। पंचशीलों का पालन करने वालों का शायद कोई अन्य लोग आदर न करें, मगर आर्य लोग करेंगे, और उन्हीं का आदर सबसे मायने रखता है।

परंतु, बिना किसी आर्य या ज्ञानी व्यक्ति से वास्तव में मिले, ऐसे किसी अमूर्त कुल में शामिल होना शायद ही किसी के काम आए। कठिन है उदार या दयालु बनना जब आस-पास का समाज ऐसे गुणों का खुले-आम मज़ाक उड़ाता है, और इनके बजाय चालाकी और स्वार्थ की प्रशंसा करता है। यहां बौद्ध समुदायों का पात्र सामने आता है। वे आधुनिकता की बेपरवाह प्रवृत्ति से नाता तोड़कर बड़े प्रेम से कह सकते हैं कि वे अपने सदस्यों में संयम और सहृदयता को महत्व देते हैं। ऐसा करने से, वे बुद्ध के पूरे औषधि मार्ग को अपनाने के लिए एक स्वस्थ वातावरण प्रदान करते हैं – शीलवान कर्मों के जीवन में ध्यान और प्रज्ञा की साधना। ऐसे वातावरण में हम पाएंगे कि साधना को कोई भी मिथकों की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह एक सच्चे जीवन के अस्तित्व पर आधारित है। तुम अपने जीवन जीने के पैमानों को देखकर, एक परिपक्व और ज़िम्मेदार मनुष्य के रूप में, आराम से सांस ले सकते हो और छोड़ सकते हो।